106 बाबा साहेब डा. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
अनुच्छेद 23 (जारी)
ऽ श्रीमान् उपाध्यक्ष (डॉ. एच.सी. मुखर्जी) ः हम अनुच्छेद 23 पर पुनः चर्चा आरंभ करेंगे जिसके प्रति दो संशोधन प्रस्तावित किए गये हैं। संशोधन सं. 677 राष्ट्रभाषा और लिपि से संबंधित है अतः स्थगित किया जाता है। संशोधन सं. 678, 679, 680 और 681 साथ-साथ लिए जाएंगे क्योंकि ये एक जैसे अर्थ वाले हैं। मैं संशोधन सं. 678 को प्रस्तावित करने की अनुमति दे सकता हूँ।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर (बम्बई - जनरल) ः महोदय, मैं प्रस्ताव करता हूँ -
फ्कि अनुच्छेद 23 की धारा (1) में, शब्दों ‘लिपि और संस्कृति’ के लिए शब्दों ‘लिपि या संस्कृति’ को प्रतिस्थापित किया जाए।य्
परिवर्तन केवल ‘और’ से ‘या’ का है और परिवर्तन की आवश्यकता इतनी स्पष्ट है कि मैं नहीं सोचता कि मुझे इसके बारे में कुछ कहने की आवश्यकता है।
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[#] श्रीमान् उपाध्यक्ष - संशोधन नं. 679-
श्री एच.बी. कामथ (सी.पी. एवं बेरार - जनरल) ः मुझे डॉ. अम्बेडकर ने पहले से ही रोक दिया है। इसलिए मैं संशोधन सं. 679 को प्रस्तावित नहीं करता।
श्रीमान् उपाध्यक्ष - क्या आप संशोधन सं. 680 के लिए अनुरोध करना चाहते हैं-
मोहम्मतद इस्माइल साहिब (मद्रास - जनरल) ः हाँ।
श्रीमान् उपाध्यक्ष - क्या आप चाहते हैं कि 681 प्रथम भाग को मतदान के लिए रखा जाना चाहिए?
प्रो. के.टी. शाह (बिहार - जनरल) ः प्रथम भाग का डॉ. अम्बेडकर के संशोधन द्वारा समावेश कर लिया गया है। मैं दूसरे भाग का प्रस्ताव करना चाहूँगा।
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[@] श्री जयपाल सिंह (बिहार - जनरल) ः श्रीमान् उपाध्यक्ष, महोदय, मुझे इस संशोधन का स्वागत करते हुए बहुत अधिक खुशी है, अधिक इसलिए क्योंकि डॉ. अम्बेडकर के द्वारा इसे उपयुक्त ढंग से संशोधित कर दिया गया है और मैं आशा करता हूँ कि यह संशोधन सदन द्वारा स्वीकार कर लिया जाएगा। महोदय, मेरे विचार से, यह अनुच्छेद भारत के लिए एक नये युग का सूत्रपात करता प्रतीत होता है ........
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ऽ # @ वही, पृष्ठ 895सी.ए.डी., अंक सी.ए.डी., अंक VIIVII, 8 दिसम्बर, 1948, पृ. 895, 8 दिसम्बर, 1948, पृ. 907