अनुच्छेद 23 (जारी) - Page 122

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श्रीमान् उपाध्यक्ष ः डॉ. अम्बेडकर।

प्रो. शिब्बनलाल सक्सेना (संयुक्त प्रांत - जनरल) ः महोदय, मुझे कुछ कहना है, और ........................

श्रीमान् उपाध्यक्ष ः मैं चर्चा को और अधिक समय तक जारी रखने की अनुमति नहीं दे सकता और इस संबंध में मेरा फैसला अन्तिम है।

प्रो. शिब्बनलाल सक्सेना ः कुछ लोगों को अनुमति दे देना और दूसरों को न देना, उचित नहीं है।

श्रीमान् उपाध्यक्ष ः मैं जानता हूँ कि यह अनुचित माना जाता है। डॉ. अम्बेडकर।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ः महोदय, अनुच्छेद 23 के प्रति प्रस्तावित किए गये संशोधनों में से, मैं पंडित ठाकुर दास भार्गव द्वारा संशोधन सं. 26 से लेकर संशोधन सं. 687 तक स्वीकार कर सकता हूँ। मैं संशोधन सं. 31 से संशोधन सं. 690 तक, पंडित ठाकुरदास भार्गव द्वारा ही प्रस्तावित स्वीकार करने के लिए तैयार हूँ। अन्य प्रस्तावित संशोधनों में से मेरे विचार से केवल दो ही संशोधनों का उत्तर देने की आवश्यकता है, वे श्रीमान् लारी द्वारा प्रस्तावित संशोधन सं. 676 और सं. 714 हैं। मैं सोचता हूँ कि यह वांछनीय होगा, यदि मैं अपने उत्तर के दौरान इन संशोधनों से उत्पन्न प्रश्नों को अलग-अलग कर देता हूँ।

संशोधन सं. 676 अल्पसंख्यकों के सांस्कृतिक अधिकार से संबंध रखता है, जबकि दूसरा संशोधन, सं. 714 प्रश्न उठाता है कि क्या किसी अल्पसंख्यक को संविधान में निहित आरंभिक अवस्था में शिक्षा को मातृभाषा में प्राप्त करने का मूलाधिकार नहीं होना चाहिए?

प्रथम प्रश्न के बारे में, मेरे मित्र श्रीमान् लारी और मेरे मित्र श्रीमान् मौलाना हसरत मोहानी दोनों ही ने प्रारुप समिति पर इस सदन द्वारा मूलाधिकार में निहित मूल सिद्धांत को बदलने का आरोप लगाया है। यह बिल्कुल सही है कि पैरा 8 की मूलाधिकारी समिति की भाषा प्रारुप समिति द्वारा बदल दी गई है, लेकिन मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि प्रारूप समिति के पास भाषा में फेरबदल करने के लिए पर्याप्त आधार था।

पहली बात जो मैं सदन में पेश करना चाहता हूँ कि प्रारुप समिति ने मूलाधिकारों के पैरा 18 की मात्रा को बदलना क्यों जरूरी समझा, वह यह है कि मौलिक मूलाधिकारों में निहित पैरा को पढ़ने पर यह मालूम पड़ जाएगा कि उसमें प्रयुक्त शब्द ‘अल्पसंख्यक’ अपने उस पारिभाषिक अर्थ में प्रयुक्त नहीं हुआ है जिस अर्थ में हम ‘अल्पसंख्यक’ शब्द का प्रयोग कुछ राजनीतिक सुरक्षाओं के उददेश्य जैसे - विधायिका में प्रतिनिधित्व, सेवाओं ् में प्रतिनिधित्व आदि के लिए करने के आदी हैं। यह शब्द अल्पसंख्यक के लिए न केवल शब्द के पारिभाषिक अर्थ को दर्शाने के लिए किया जाता है बल्कि यह उन अल्पसंख्यकों को भी शामिल करने के लिए प्रयुक्त होता है जो पारिभाषिक अर्थ में ‘अल्पसंख्यक’ नहीं हैं_

♣ वही, पृष्ठ 922-25