अनुच्छेद 23 (जारी) - Page 124

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हूँ जैसा कि हम संविधान में प्रयोग करते हैं। इसी कारण हमने मूल धारा में से शब्द ‘अल्पसंख्यक’ निकाल दिया है।

लेकिन जबकि शब्द ‘अल्पसंख्यक’ को निकाल दिया गया है मेरे मित्र श्रीमान् लारी यह देखना भूल गये कि हमने उस सुरक्षा में बहुत बड़ा सुधार कर दिया है जो उस मूल अनुच्छेद में दी गई थी जो मूलाधिकारों में था। मूल अनुच्छेद जिस रूप में यह मूलाधिकारों में था, ने राज्य के लिए केवल एक प्रकार का कर्त्तव्य निर्धारित कर दिया कि राज्य उनकी संस्कृति, उनकी भाषा, और उनकी लिपि की रक्षा करेगा। मूल अनुच्छेद ने इन विभिन्न समुदायों को कोई मूलाधिकार नहीं दिया था। इसने केवल कर्त्तव्य कर दिया और एक धारा जोड़ दी कि जबकि राज्य को भाषा, संस्कृति और लिपि के इन अधिकारों पर पाबंदियां लगाने का अधिकार हो सकता है लेकिन राज्य ऐसे कानून नहीं बनायेगा जिन्हें दमनकारी कहा जा सके। यद्यपि ऐसी बात नहीं है कि राज्य को इन मामलों को प्रभावित करने वाले किसी कानून को बनाने का अधिकार नहीं है, लेकिन कानून दमनकारी नहीं होगा। अब मुझे इसके बारे में पूरा यकीन है कि मूल अनुच्छेद में अनुदत्त सुरक्षा बहुत असुरक्षित थी। यह राज्य की सदिच्छा पर निर्भर थी। वर्तमान स्थिति जैसी आप पाते हैं, अनुच्छेद 23 में बतलायी गई है कि हमने इसे मूलाधिकार में बदल दिया है, ताकि यदि कोई राज्य ऐसा कानून बना देता है जो इस अनुच्छेद के प्रावधानों के अप्रासंगिक है तो वह कानून अनुच्छेद 8, जिसे हम पहले ही पारित कर चुके हैं वे आधार पर अमान्य हो जायेगा।

इसलिए, मेरे मित्र श्रीमान् लारी और मौलाना देखेंगे कि उनके दृष्टिकोण में मूल अनुच्छेद में जो कुछ था उससे बेहतर सुधार किया गया है। प्रारुप समिति द्वारा बदलाव के फलस्वरूप निश्चित रूप से स्थिति बदतर नहीं हुई है।

दूसरे प्रश्न पर आते हुए, अर्थात, कि क्या इस संविधान में इतने अधिक शब्दों में स्पष्ट ् रूप से यह सम्मिलित नहीं करना चाहिए कि मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार एक मूलाधिकार है - मैं एक बात कहना चाहता हूँ और वह है कि मैं नहीं समझता कि विवेकशील व्यक्तियों के बीच कोई विवाद इस बात को लेकर हो सकता है कि यदि प्राथमिक शिक्षा लाभप्रद है और इसे वास्तविकता प्रदान करनी है तो यह शिक्षा बच्चे को उसकी मातृभाषा में दी जानी चाहिए। अन्यथा प्राथमिक शिक्षा महत्वहीन और अर्थहीन होगी। मुझे विश्वास है कि इस विषय में कोई विवाद नहीं है और यह कहने के लिए मैं नही समझता कि मुझे उस सरकार की प्रामाणिकता की आवश्यकता है जिससे मैं संबंध रखता हूँ। यह एक सर्वमान्य सिद्धांत है और यह इतना र्तकसंगत है कि इस पर विवाद हो ही नहीं सकता। प्रश्न है कि क्या हमें इसे कानून में शामिल करना चाहिए या संविधान में। मैं निःसंकोच कहना चाहता हूँ कि इस मामले को संविधान के विशेष अनुच्छेद में रखने में कठिनाई है। यह सच है, जैसा कि मेरे मित्र पंडित कुँजरू ने अवलोकन किया, कि इस प्रकार के मूलाधिकार को लागू करने में जो कठिनाई महसूस की जा सकती थी वह कुछ हद तक मेरे मित्र श्रीमान् करीमुददीन के द्वारा प्रस्तावित इस संशोधन से कम या दूर हो गई ् है कि इस प्रकार का सिद्धांत उसी स्थिति में लागू होना चाहिए जहाँ एक पर्याप्त संख्या ऐसे