4 बाबा साहेब डा. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
फ्कि अनुच्छेद 1 में जहाँ कहीं भी फ्राज्यय् शब्द आता है उसे फ्प्रदेशय् से प्रतिस्थापित किया जाए और परिणामी परिवर्जन सम्पूर्ण प्रारूप संविधान में किए जाएं।य्
मैं समझता हूँ कि इसके विरोध में बहुमत है।
श्री एच.वी. कामथ ः मैं मत विभाजन की माँग करता हूँ।
श्रीमान् उपाध्यक्ष ः मुझे यह लगता है कि इसके विरोध में बहुमत है। इसलिए मुझे विभाजन के लिए कहने की आवश्यकता नहीं है। मेरे पास इस आग्रह को न मानने का अधिकार है। मैं माननीय सदस्यों से स्थिति पर विचार करने का अनुरोध करता हूँ। यह बिल्कुल स्पष्ट लगता है कि इस प्रस्ताव के विरोध में बहुमत है।
माननीय श्री घनश्याम सिंह गुप्ता ः मैं स्थिति को स्वीकार करता हूँ कि विरोध पक्ष का बहुमत है।
माननीय पंडित जवाहरलाल नेहरू ः क्या मैं सुझाव दे सकता हूँ कि हम गिनती करने के स्थान पर केवल हाथ उठा दें। उससे साफ संकेत मिलेगा कि मामले की क्या स्थिति है।
श्रीमान् उपाध्यक्ष ः क्या माननीय श्री जी.एस. गुप्ता स्वीकार करते हैं कि इसके विरोध में बहुमत है?
माननीय श्री घनश्याम सिंह गुप्ता - मैं इस स्थिति को स्वीकार करता हूँ कि इसके विरोध में बहुमत है।
संशोधन अस्वीकृत हुआ।
श्री एच.वी. कामथ ः महोदय, मैं प्रस्ताव करता हूँ -
फ्कि अनुच्छेद 1 की धारा (1) में फ्राज्यय् शब्द के लिए फ्प्रांतय् शब्द प्रतिस्थापित किया जाए।य्
(चर्चा आगे है।)
ऽ माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर ः महोदय, मैं इस संशोधन को स्वीकार नहीं करता।ऽ ऽ ऽ ऽ
(इस समय श्री हिम्मत सिंह और के. माहेश्वरी बोलने के लिए उठे।)
श्रीमान् उपाध्यक्ष - माननीय डॉ. अम्बेडकर पहले ही इस बहस का उत्तर दे चुके हैं और मुझे खेद है कि मैं इस प्रस्ताव पर आगे बहस की अनुमति नहीं दे सकता।
पंडित ”दयनाथ कुँजरू (संयुक्त प्रांत - जनरल) ः महोदय, यदि किसी सदस्य द्वारा प्रस्तुत प्रत्येक प्रस्ताव के बाद आप डॉ. अम्बेडकर से पूछते हैं कि क्या वे इससे सहमत हैं और उनको अपने विचार व्यक्त करने की अनुमति देने के बाद आप अन्य सदस्यों को विषय पर बोलने से वंचित कर देते हैं तो सदन के लिए यह बहुत कठिन स्थिति होगी।
ऽ सी.ए.डी., खण्ड VII, 15 नवम्बर, 1948, पृष्ठ 413