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श्रीमान् उपाध्यक्ष ः मुझे डर है कि पंडित ”दयनाथ कुँजरू को मेरी स्थिति का सही एहसास नहीं है। मैं यहाँ प्रत्येक सदस्य को हर संभव सुविधा देने के लिए सदैव तैयार हूँ। इसके लिए जो मैने पिछले कुछ दिनों में किया है उसका संदर्भ देने के अतिरिक्त मुझे आगे कुछ साबित करने की जरूरत नहीं है। लेकिन अभी हमारे पास वक्त की कमी है। श्रीमान् कामथ द्वारा संशोधन का प्रस्ताव प्रस्तुत करने के बाद मैंने यह देखने के लिए कुछ समय तक इन्तजार किया कि क्या कोई खड़ा हुआ है और कोई खड़ा नहीं हुआ और जब विशेषकर मैंने पाया कि श्रीमान् कामथ ने तर्कों को दोहराया है तब मैंने सोचा कि मैं डॉ. अम्बेडकर से यह पूछकर कि क्या वह जवाब देना चाहते हैं सदन की इच्छाओं के विरुद्ध नहीं जाऊँगा। अगर मैं सदन का रवैया समझने में असफल रहा हूँ जो इसके लिए मुझे खेद है।
पंडित ”दयनाथ कुँजरू ः यह बिल्कुल आपका अधिकार है कि उस अनुच्छेद पर चर्चा की अनुमति न दें जिसे आप महत्वहीन समझते हैं या जिस पर आप सोचते हैं कि पर्याप्त चर्चा हो चुकी है। चर्चा समाप्त करने की आपको शक्ति प्राप्त है और प्रभारी सदस्य को आप उत्तर देने के लिए कह सकते हैं। यदि इस शक्ति का प्रयोग करके ही आपने डॉ. अम्बेडकर से उत्तर देने को कहा है तो इस पर कोई आपत्ति नहीं की जा सकती।
श्रीमान् उपाध्यक्ष ः तब मैं संशोधन पर मत लेता हूँ।
श्रीमान् कामथ का प्रस्ताव अस्वीकृत हुआ।
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ऽ श्री महावीर त्यागी ः महोदय, मैं बहुत उत्सुक नहीं हूँ कि मेरे संशोधन में वर्णित सभी शब्दों को अन्तर्विष्ट कर लिया जाये। मैं यह भी नहीं चाहता हूँ कि मैं भाषण दूँ और सदन का समय बर्बाद करूँ। लेकिन मैं एक बात स्पष्ट कर देना चाहता हूँ और इस उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए मैं औपचारिक रूप से इस संशोधन का प्रस्ताव करूँगा-
फ्कि अनुच्छेद 1 की धारा (1) में फ्राज्योंय् शब्द के लिए फ्गणतंत्रीय राज्य तथा केन्द्र की सम्प्रभुता लोगों के पूर्ण निकाय में निहित रहेगी,य् शब्दों से प्रतिस्थापित किया जाए।य्
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! श्रीमान् उपाध्यक्ष ः मैं अब इस संशोधन पर मत लूँगा।
श्री महावीर त्यागी ः श्रीमान् उपाध्यक्ष महोदय, मेरे विचार से जो विद्वान प्रारूपकार ने कहा है, अर्थात् सम्प्रभुता इस प्रारुप के बावजूद, लोगों में निहित रहेगी, मैं अपने
ऽ ! वही, पृष्ठ 418 सी.ए.डी., खण्ड VII 15 नवम्बर, 1948, पृष्ठ 413