6 बाबा साहेब डा. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
संशोधन को स्वीकार करने पर जोर नहीं देना चाहता। महोदय, मैं आशा करता हूँ कि डॉ. अम्बेडकर सहमत होंगे कि इस प्रारूप का अर्थ है कि सम्प्रभुता लोगों में निहित है, और उनका स्पष्टीकरण भविष्य में संदर्भ के लिए रिकॉर्ड में दर्ज कर लिया जायेगा।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ः निस्संदेह, यह लोगों में निहित है। मैं अपने मित्र से कहना चाहता हूँ कि मुझे तनिक भी आपत्ति न होगी यदि यह मामला एक बार फिर तब उठाया जाता है जब हम उद्देशिका पर चर्चा करेंगे।
श्री महावीर त्यागी ः तब मैं सदन से अपने संशोधन को वापस लेने की अनुमति चाहता हूँ।
सभा की अनुमति से संशोधन वापस लिया गया।
प्रो. के.टी. शाह ः श्रीमान् उपाध्यक्ष, महोदय, मैं यह प्रस्ताव करता हूँ -
फ्कि अनुच्छेद 1 की धारा (1) में ‘राज्य’ शब्द के पहले ‘आपस में समान’ शब्दों को जोड़ा जाए।य्
(प्रो. शाह ने संशोधन की व्याख्या की और उसके बाद चर्चा हुई।)
! माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर ः महोदय, मैं इस संशोधन का विरोध करता हूँ।
श्रीमान् उपाध्यक्ष ः मैं संशोधन को मतदान के लिए रखता हूँ।
संशोधन अस्वीकृत हुआ।
श्रीमान् नज़ीरुद्दीन अहमद ः महोदय, मैं प्रस्ताव करता हूँ-
फ्कि अनुच्छेद 1 की धारा (1) के अंत में, अधोलिखित को अन्तर्विष्ट किया जाए’’।
फ्और भारत को संयुक्त राज्य के नाम से जाना जायेगा।य् महोदय, यह विवादरहित संशोधन है ......
....... अन्य संशोधन इसके विकल्प हैं। मैं प्रस्ताव करता हूँ --
फ्कि अनुच्छेद 1 की धारा (1) के अंत में, अधोलिखित को अन्तर्विष्ट किया जाएय्-
फ्और ‘भारत को संघ के नाम से जाना जायेगा’।य्
........ मेरा दूसरा संशोधन यह है। मैं प्रस्ताव करता हूँ-
! सी.ए.डी., अंक VII, 15 नवम्बर, 1948, पृष्ठ 421