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फ् कि अनुच्छेद 1 की धारा (1) के अंत में, अधोलिखित को सन्निविष्ट किया जाए-य्
फ्और ‘भारतीय संघ’ के नाम से जाना जायेगा।य्
महोदय, मैं इन तीन विकल्पों को सामने रखता हूँ। मैं प्रथम को वरीयता दूँगा लेकिन यह सब सदन पर निर्भर करता है कि वह इनके बारे में क्या राय रखता है।
¹संशोधन पर कामथ की आलोचना के बाद डॉ. अम्बेडकर उत्तर देने के लिए उठे।ह्
ऽ ऽ ऽ ऽ
ख्ऽ, माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर - महोदय, मैं इन सभी संशोधनों का विरोध करता हूँ। प्रथम संशोधन के संबंध में कि ‘भारत’ को ‘भारत के संयुक्त राज्य’ के नाम से जाना जाये, मेरे मित्र श्री कामथ ने जो तर्क दिया है उससे मैं अंतःकरण से सहमत हूँ। मैं अपने विचार पहले ही व्यक्त कर चुका हूँ कि मैने ‘यूनियन’ शब्द का क्यों प्रयोग किया और ‘डरेशन’ शब्द का प्रयोग क्यों नही किया।
दूसरे संशोधन के संबंध में, कि भारत को ‘भारत को संघ’ के नाम से जाना जाये, इसे भी मैं अनावश्यक कहता हूँ क्योकि हमारा हमेशा ही यह मत है कि इस देश को ‘भारत’ के नाम से ही जाना जाये बिना कोई यह संकेत देते हुए कि भारतीय संघ के घटक हिस्सों का इसके शीर्षक नाम से क्या संबंध है। भारत अपने पूरे इतिहास में ‘भारत’ के नाम से ही जाना जाता रहा है। यू.एन.ओ. के सदस्य के रूप में भी देश का नाम ‘भारत’ ही है और सभी समझौते इसी नाम से किए जाते हैं और मेरे विचार से देश के नाम से किसी भी अर्थ में यह संकेत नहीं जाना चाहिए कि यह किन अधीनस्थ भागों या हिस्सों से मिलकर बना है। इसलिए जहाँ तक इन संशोधनों का संबंध है, मैं संशोधनों का विरोध करता हूँ और यह मानता हूँ कि जिस रूप में प्रारुप प्रस्तुत किया गया है यह सर्वोत्तम है।
श्रीमान् उपाध्यक्ष ः मैं अब एक के बाद एक संशोधन पर मत लूंगा।
श्रीमान् नज़ीरुद्दीन अहमद ः महोदय, मैं संशोधनों को वापस लेने की अनुमति मांगता हूँ।
सभा की अनुमति से, संशोधन वापस ले लिए गए।
श्रीमान् उपाध्यक्ष - संशोधन संख्या 113।
श्रीमान ् नज़ीरुद्दीन अहमद ः मैं 113 का प्रस्ताव नहीं कर रहा हूँ। लेकिन मैं 114 का प्रस्ताव कर रहा हूँ। महोदय, मैं प्रस्ताव प्रस्तुत करता हूँ-
फ्कि अनुच्छेद 1 की धारा (2) में, ‘दि’ शब्द जो शुरू में आया है का लोप कर दिया जाए।य्
ऽ ऽ ऽ ऽ
ऽ सी.ए.डी., (आधिकारिक प्रतिवेदन), अंक VII, 15 नवम्बर, 1948, पृष्ठ 422