8 बाबा साहेब डा. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
# माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ः महोदय, मैं औचित्य का प्रश्न उठाता हूँ। मेरा औचित्य का प्रश्न यह है कि यह तब तक संशोधित नहीं हो सकता जब तक कि यह मूल प्रस्ताव का अर्थ न बदल दे। मैं मई के संसदीय आचरण का संदर्भ ढूँढने का प्रयत्न कर रहा हूँ। लेकिन मैं इस बात को इसी क्षण उठाना चाहूँगा। यदि मेरे मित्र मुझे क्षमा करें तो मैं कहना चाहूँगा कि उन्हें सभी प्रकार के संशोधनों, जैसे - अमुक स्थान पर अल्पविराम चाहिए, अमुक स्थान पर नहीं चाहिए, इत्यादि, का प्रस्ताव करने की आदत है और मेरे विचार से हमें ऐसी चीजों पर शुरू में ही विराम लगा देना चाहिए।
श्रीमान् नज़ीरुद्दीन अहमद ः स्वतंत्रता के शुरू में ही यदि मुझे इस तरह रोका जायेगा तो मैं हार मानता हूँ और सभापति की बात मानता हूँ।
श्रीमान् उपाध्यक्ष ः औचित्य के प्रश्न पर आपका क्या उत्तर है?
श्रीमान् नज़ीरूद्दीन अहमद ः औचित्य के प्रश्न पर मेरा उत्तर यह है कि मैं अनुच्छेद से ‘दि’ शब्द को निकालना चाहता हूँ और इसलिए यह एक संशोधन है। यह निश्चित रूप से एक प्रारुप संशोधन है। इसका इस आधार पर विरोध किया जा सकता है कि यह महत्वहीन, अतार्किक या उद्देश्यविहीन या निरर्थक है और ऐसे ही अन्य आधारों पर। लेकिन डॉ. अम्बेडकर का यह कहना कि यह एक संशोधन ही नहीं है, उचित नहीं है। तकनीकी आधार पर इसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि यह एक संशोधन नहीं है।
और मेरे माननीय मित्र ने जो यह कहा है कि मुझे कॉमा, पूर्ण विराम आदि जैसी छोटी-छोटी बातों पर संशोधन प्रस्ताव करने की आदत है उसके बारे में मुझे उनको तथा सदन को यह सूचित करते हुए खुशी हो रही है, कि जहाँ तक इस संशोधन का संबंध है मैने यह आदत त्याग दी है। (हँसी)
श्रीमान् उपाध्यक्ष ः आप कहते हैं कि यह एक प्रारूप संशोधन है। क्या हम इसे प्रारुप समिति तथा इसके अध्यक्ष पर इसे तीसरे पठन के दौरान देखे जाने के लिए नहीं छोड़ सकते। मुझे विश्वास है कि यदि इनमें कुछ सार है तो वे इन संशोधनों को स्वीकार कर लेंगे।
श्रीमान ् नज़ीरुद्दीन अहमद ः उस स्थिति में, मामले को सदन के फैसले के लिए छोड़े जाने के स्थान पर प्रारुप समिति के लिए छोड़ने जैसा होगा। प्रारुप समिति के प्रवक्ता पहले ही अपनी राय व्यक्त कर चुके हैं। इसलिए, यदि मैं इसके प्रारुप समिति के लिए छोड़े जाने के लिए तैयार हो जाऊं तो उससे अच्छा है कि मैं इसे वापस ले लूँ। इसलिए मुझे फिर कहना पड़ेगा कि ‘दि’ शब्द नाम का हिस्सा नहीं है।
श्रीमान् उपाध्यक्ष ः मैं इस पर डॉ. अम्बेडकर को सुनने की प्रतीक्षा कर रहा हूँ।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ः महोदय, मेरी समझ में नहीं आता कि माननीय सदस्य को ‘दि’ शब्द पर क्यों आपत्ति है। ‘दि’ एक निश्चयवाचक अव्यय है और यह
# वही, पृ. पृ. 422-24