अनुच्छेद 3 - Page 30

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दूसरा परिवर्तन यह है - मूल अनूच्छेद 3 के तहत भारत सरकार की विधि-निर्माण की शक्ति, उन दो शर्तों द्वारा सीमित कर दी गई थी जो (क) ( i ) और ( ii ) में उल्लिखित है। वे शर्तें थीं कि किसी कार्यवाही को प्रारंभ करने से पूर्व राज्य की विधायिका में क्षेत्र के प्रतिनिधियों को राष्ट्रपति को प्रतिनिधित्व अवश्य देना चाहिए जिनका बहुमत है, अथवा इस संबंध में किसी ऐसे राज्य की विधायिका को प्रस्ताव अवश्य पारित करना चाहिए जिसका नाम और सीमायें विधेयक में निहित प्रस्ताव से प्रभावित होंगी। यहाँ पुनः यह बताया गया कि वहाँ अल्पसंख्यक भी हो सकते हैं जो बड़ी तीव्रता से महसूस करते हों कि उनकी स्थिति तब तक संरक्षित नहीं होगी जब तक कि राज्य की सीमा बदल नहीं दी जाती और जब तक उन विशेष अल्पसंख्यकों को दूसरे राज्य में अपने भाइयों के साथ सम्मिलित होने की अनुमति नहीं दी जाती, यदि परिणामस्वरूप, ये भाई वहाँ बने रहें तो कार्यवाही पूर्णतया पंगु हो जाएगी। परिणाम के तौर पर, संशोधित प्रारुप में हम प्रस्ताव करते हैं कि मूल अनुच्छेद में से (क) ( i ) और ( ii ) तथा (ब) को निकाल दिया जाए। इन्हें दो भागों (अ) और (ब) में विभक्त किया गया है। (अ) उस क्षेत्र से संबंध रखता है जो भाग I में राज्यों अर्थात ् प्रांतों को प्रभावित करता है और नये संशोधन के (ब) को संबंध उससे है, जिन्हें अब भारतीय राज्य कहा जाता है। मेरे संशोधन के उपखण्डों (अ) और (ब) में मुख्य अंतर यह है -- (अ) के मामले में अर्थात ् भाग I में आने वाले राज्यों के क्षेत्रों के पुनर्गठन के संबंध में केवल परामर्श की आवश्यकता है। स्वीकृति की आवश्यकता नहीं है। राष्ट्रपति को सिफारिश करने से पहले स्वयं को इस विषय में संतुष्ट कर लेना चाहिए कि उसकी इच्छाओं पर परामर्श ले लिया गया है।

(ख) के संबंध में प्रावधान है कि उस पर सहमति होगी। जैसा मैने कहा, अंतर इस तथ्य पर आधारित है कि जहाँ तक वर्तमान का संबंध है, प्रांतों की स्थिति राज्यों की स्थिति से भिन्न है। राज्य सम्प्रभु राज्य हैं और प्रांत सम्प्रभु राज्य नहीं है। फलस्वरूप, सरकार को प्रांतों की सीमायें बदलने के लिए उनकी स्वीकृति आवश्यक नहीं है, जबकि भारतीय राज्यों के मामले में यह बिल्कुल उचित है, इस तथ्य के मद्देनजर कि वे सम्प्रभु हैं, उनकी स्वीकृति प्राप्त की जानी चाहिए।

प्रो. शाह द्वारा प्रस्तावित संशोधन के संबंध में, मुझे उनके और नये परंतुक के उपखण्ड (क) में निहित अपने संशोधन में विशेष अंतर नहीं दिखाई देता। वह कहते हैं कि चर्चा राज्यों में शुरू की जायेगी। परंतुक के उपखण्ड (क) में मैने भी उपबंध किया है कि राज्यों से परामर्श किया जाएगा। मुझे इसके बारे में जरा भी संदेह नहीं है कि परामर्श करने का तरीका, जैसा राष्ट्रपति अपनायेंगे वह इस प्रकार का होगा जिसके तहत राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या राज्यपाल को एक प्रस्ताव पेश करने के लिए कहेंगे जिस पर उस विशेष राज्य की विधायिका में चर्चा हो सकती है जो इससे प्रभावित हो सकता है, ताकि आखिरकार शुरूआत स्थानीय विधायिका द्वारा ही होगी और संसद द्वारा कतई नहीं। इसलिए मैं कहता हूँ कि प्रो. शाह का संशोधन वास्तव में अनावश्यक है।