अनुच्छेद 3 - Page 32

17

इन अवलोकनों के साथ, मैं संशोधन का जोरदार समर्थन करता हूँ और आशा करता हूँ कि डॉ. अम्बेडकर यह बात स्पष्ट कर देंगे कि राज्यों के मामले में यह भेद क्यों बरता गया है, उन्होंने ऐसा क्यों कहा है कि प्रांतों के मामलों में विधायिका के विचारों से अवगत होना चाहिए, जबकि राज्यों के मामले में उन्होंने कहा है कि उनकी पूर्व स्वीकृति प्राप्त की जानी चाहिए।

श्रीमान् उपाध्यक्ष ः डॉ. अम्बेडकर।

एक माननीय सदस्य ः महोदय, अब प्रश्न रखा जाए।

मौलाना इसरत मोहानी (संयुक्त प्रांत - मुसलमान) ः महोदय, मैं नियम संबंधी आपत्ति उठाता हूँ। डॉ. अम्बेडकर ने केवल एक संशोधन प्रस्तुत किया है और इसलिए मैं कहता हूँ कि उन्हें देने का कोई अधिकार नहीं है। मेरे पास सदन का एक विनिर्णय है जिसमें यह निश्चित रूप से कहा है .......

श्री आर.के. सिधवा ः मैं समझता हूँ कि पूरा अनुच्छेद चर्चा के अधीन है। यदि अनुच्छेद चर्चा के अधीन है तो डॉ. अम्बेडकर को उत्तर देने का अधिकार है।

मौलाना हसरत मोहनी ः डॉ. अम्बेडकर पहले ही बोल चुके हैं, उन्हें आगे भाषण देने का कोई अधिकार नहीं है।

श्रीमान् उपाध्यक्ष - कृपया सभापीठ को सम्बोधित करें।

मौलाना हसरत मोहनी ः महोदय, मैं यह बताना चाहता हूँ कि विनिर्णय में कहा गया है- मैं इस सदन में हुई कार्यवाहियों से जो कि प्रकाशित हो चुकी हैं, उद ् धृत कर रहा हूँ- संशोधन के प्रस्तावक को उत्तर देने का कोई अधिकार नहीं है। यह दूसरा भाषण नहीं दे सकता।

श्रीमान् उपाध्यक्ष ः मेरा मानना है कि अनुच्छेद एवं संशोधन दोनों ही चर्चा के अधीन हैं। डॉ. अम्बेडकर।

माननीय श्री घनश्याम सिंह गुप्ता (सी.पी. एवं बेरार - जनरल) ः महोदय, प्रस्तावक को उत्तर देने का अधिकार है।

श्रीमान् उपाध्यक्ष ः यह मेरी बात को मजबूती प्रदान करता है।

माननीय श्री घनश्याम सिंह गुप्ता - मेरे कहने को अर्थ है, महोदय, मैं कहता हूँ कि प्रत्येक प्रस्तावक को उत्तर देने का अधिकार प्राप्त है।

श्रीमान् उपाध्यक्ष ः आपको डॉ. अम्बेडकर के उत्तर देने पर आपत्ति नहीं है?

माननीय श्री घनश्याम सिंह गुप्ता - मैं आपत्ति तो करता ही नहीं हूँ। साथ ही मैं यह प्रचलन भी स्थापित करना चाहता हूँ कि किसी संशोधन के प्रस्तावक को उत्तर देने का अधिकार नहीं है क्योंकि हमारे नियम उन नियमों से बहुत भिन्न है जिन्हें वैधानिक पक्ष के लिए बनाया गया है।