18 बाबा साहेब डा. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
श्रीमान् उपाध्यक्ष ः यह हम बाद में, डॉ. अम्बेडकर के उत्तर देने के बाद, तय करेंगे।
श्री लक्ष्मीनारायण साहू (उड़ीसा - जनरल) ः महोदय, संशोधन प्रस्तावकों की सूची में मेरा नाम है।
श्रीमान् उपाध्यक्ष ः श्रीमान् साहू, कृपया अपनी सीट पर बैठ जाइये। डॉ. अम्बेडकर।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर (बम्बई - जनरल) ः मेरे मित्र श्रीमान् कुँजरू द्वारा प्रस्तावित संशोधन के प्रति मेरी अपार सहानुभूति है लेकिन दुर्भाग्य से, वर्तमान परिस्थितियों में, मैं इसे स्वीकार करने की स्थिति में नहीं हूँ। अपने संशोधन के समर्थन में मेरे मित्र द्वारा यहाँ तर्क दिया गया कि अपने संशोधन का प्रस्ताव करते हुए मैने जो कहा था यह संविधान में निहित कुछ अन्य अनुच्छेदों या धाराओं के परस्पर विरोध में था। उन्होंने कहा कि प्रांतों और राज्यों में भेद को उचित ठहराने के संबंध में, अनुच्छेद 3 में निहित प्रावधानों के मामले में मैंने जो स्पष्टीकरण दिए थे वह अनुच्छेद 226, 230 और 294 के परस्पर विरोध में थे। अब मेरा कहना यह है कि मैने राज्यों और प्रांतों के भेद के समर्थन में अपने स्पष्टीकरण में जो कहा था और उन विभिन्न अनुच्छेदों, जिनका उन्होंने संदर्भ दिया है, में कोई परस्पर विरोध नहीं है।
अनुच्छेद 226 जो केन्द्रीय विधायिका को प्रांतीय सूची में सम्मिलित मामलों पर विधि-निर्माण की शक्ति देता है, के संबंध में, मेरा कहना है कि यह प्राधिकार संसद के ऊपरी सदन द्वारा दो-तिहाई बहुमत से पारित प्रस्ताव के द्वारा संसद द्वारा प्रयुक्त किया जाएगा। वह अनुभव करेंगे कि ऊपरी सदन या राज्य सभा में उतने ही प्रतिनिधि राज्यों से होंगे जितने प्रांतों से। वे सब निस्संदेह उस विशेष प्रस्ताव की कार्यवाहियों में भाग लेंगे जो इस प्रस्ताव में सम्मिलित मामलों पर विधि-निर्माण का अधिकार प्रदान करने वाला है। पणिमस्वरूप, यह कहना तनिक भी उचित नहीं है कि अनुच्छेद 226 ने स्वतः ही भारतीय राज्यों की सम्प्रभुता हथिया ली है। यह वास्तव में एक ऐसा कानून है जो ऊपरी सदन जिसमें राज्यों का पूरा प्रतिनिधित्व है के द्वारा पारित प्रस्ताव के द्वारा सम्प्रभुता प्रदान करता है। इसलिए यह परस्पर विरोध का दृष्टांत कतई नहीं है।
अनुच्छेद 230 के संबंध में भी, मेरा यही कहना है। मेरे विद्वान मित्र को यह याद रखना चाहिए कि संविधान के पारित हो जाने के बाद जो भारतीय राज्य स्थिति से, पर वर्तमान में तीन विषयों के आधार पर मिले हैं, उनमें से एक विदेशी मामला है। स्पष्टतया इस संधि पर अमल और कुछ नहीं है बल्कि केंद्रीय संसद को प्रदान की हुई शक्ति का इस संधि जो कि विदेशी मामलों की विषय-वस्तु है, को लागू करने के लिए प्रयुक्त है। इसलिए इसे उनकी सम्प्रभुता के अधिकारों को अधिग्रहण नहीं कहा जा सकता।
294 के बारे में, जो भारतीय राज्यों के अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के प्रावधानों के विस्तार से संबंधित है और जो निस्संदेह इस समय उनकी सम्प्रभुता पर एक अतिक्रमण सा लग सकता है लेकिन ऐसा है नहीं। यह मात्र उन प्रस्तावों में से एक है जो हम भारतीय राज्यों के समक्ष रखेंगे कि जब वे भारत संघ में प्रवेश चाहेंगे तब उन्हें अनुच्छेद