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294 को स्वीकार करना ही पड़ेगा। मैं कह सकता हूँ कि यह विस्तार प्रारुप समिति द्वारा किया गया था क्योंकि प्रारुप समिति की जानकारी में यह बारत आई कि कुछ भारतीय राज्यों की संविधान सभायें इस संबंध में इतने विविध और इतने चौंकाने वाले प्रावधान कर रही थीं कि उसने यह निर्धारित करना सबसे अधिक उचित समझा कि अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए किस प्रकार की व्यवस्थाओं को संघ सरकार स्वीकार करेगी और किस प्रकार की व्यवस्थाओं को स्वीकार नहीं करेगी।
अब, महोदय ब्रिटिश भारत के प्रांतों और भारतीय राज्यों में भेद के प्रश्न पर बहुत अधिक कहा जा चुका है, और मैं अच्छी तरह महसूस करता हूँ कि सदन बुरी तरह से इस अंतर पर उत्तेजित है जो संविधान रखना चाहता है लेकिन मैं सदन को दो बातें बताना चाहता हूँ। एक तो यह कि इस समय हम दो वार्ता समितियों के बीच हुए समझौते की शर्तों से बँधे हुए हैं। इनमें से एक समिति ब्रिटिश प्रांतों के प्रतिनिधित्व वाली भारतीय संविधान सभा द्वारा नियुक्त की गई थी और दूसरी भारतीय राज्यों के प्रतिनिधित्व वाली भारतीय संविधान सभा द्वारा नामित थीं ताकि एक सांझा संविधान का प्रारुप तैयार किया जा सके जो दोनों हिस्सों को सम्मिलित करता हो। अब मैं वार्ता समितियों द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट के विस्तार में नहीं जाना चाहता लेकिन यदि मेरे माननीय मित्र पंडित कुँजरू उस समिति की रिपोर्ट को पढ़कर अपनी याद ् ाश्त ताजा करें तो वह पायेंगे कि उसमें एक विशेष प्रावधान यह है कि वार्ता समिति की रिपोर्ट की किसी बात से यह नहीं समझा जायेगा कि भारत संघ को भारतीय राज्यों के क्षेत्रों के अतिक्रमण की अनुमति है। मेरा कहना है, यदि यह एक सहमति है मेरे कहने का यह अर्थ नहीं - कि इस अवस्था में दोनों पक्षों के बीच हुआ यह एक संधि या समझौता है - इस सहमति का सम्मान करने में ही हमारी भलाई है। मैं एक दूसरी बात बताना चाहूँगा- संविधान के एक अन्य अनच्छेद जिसका मेरे मित्र श्रीमान् कुँजरू ने कोई जिक्र नहीं किया है औश्र जिसका मुझे दुख है - वह अनुच्छेद 212 है जो एक बहुत महत्वपूर्ण अनुच्छेद है और मैं बताना चाहूँगा कि भारतीय राज्यों के संबंध में वास्तव में किन-किन संभावनाओं की भारतीय प्रारुप संविधान में व्यवस्था की गई है। माननीय सदस्यों को ज्ञात होगा कि अनच्छेद 3 अधिमिलन के ऐसे स्वीकृति-पत्र के आधार पर भारतीय राज्यों के प्रवेश का प्रावधान करता है जिसे वे भारतीय राज्य भारत संघ के पक्ष में कार्यान्वित कर सकें। जब एक राज्य इस तरह से भारत संघ में शामिल होता है तब केन्द्रीय सरकार और प्रांतों की तुलना में इसकी स्थिति स्वीकृति-पत्र की शर्तों द्वारा अवश्य नियमित की जानी चाहिए लेकिन भारतीय राज्यों को भारतीय संविधान में लाने का स्वीकृति-पत्र ही एकमात्र तरीका नहीं है। संविधान में एक अन्य महत्वपूर्ण राज्य का शासक अपने उस विशेष राज्य से संबंधित पूरी संप्रभुता भारत संघ को हस्तांतरित कर सकता है। जब पूरी की पूरी संप्रभुता 212 के प्रावधानों के तहत हस्तांतरित कर दी जाती है, तो उस विशेष शासक का क्षेत्र भारत संघ का क्षेत्र ही जाता है, जिसकी पूरी संप्रभुता भारत संघ में निहित होती है। तब अनुच्छेद 212 में शक्ति प्रदान की गई है जिसके तहत उस विशेष क्षेत्र, जिसकी सम्प्रभुता पूरी