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....... अन्त में, मैं डॉ. अम्बेडकर से पुनः निवेदन करता हूँ कि वे केवल अपना फ्मैं विरोध करता हूँय् सूत्र न दोहरायें बल्कि कुछ कारण भी दें कि वह ऐसा क्यों कर रहे हैं?
श्री रोहिणी कुमार चौधरी -मैं इस संशोधन का विरोध करके अपने मित्र श्रीमान् नज़ीरूद्दीन अहमद का आदर करने के लिए मंच पर आ गया हूँ (हँसी) .....
ऽ ऽ ऽ ऽ
ख्ऽ, माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ः श्रीमान् उपाध्यक्ष, महोदय, मैने नहीं सोचा था कि इस मामले पर मुझे कोई भाषण देने की आवश्यकता थी, लेकिन जैसा श्रीमान ् कामथ ने इच्छा प्रकट की है कि मुझे संशोधन को केवल नकार ही नहीं देना चाहिए बल्कि स्पष्टीकरण भी देना चाहिए कि मैं अपने माननीय मित्र नज़ीरुद्दीन अहमद के संशोधनों को स्वीकार करने के लिए क्यों तैयार नहीं हूँ, मैं अपना स्पष्टीकरण देने के लिए ही यहाँ आया हूँ। मैं समझता हूँ कि इस बात पर सहमति होगी कि इस तरह के मामलों में जिनका संबंध केवल वाक्य-रचना से है, न कि अनुच्छेद के विषय से, यह नहीं कहा जा सकता कि यह एक सैद्धांतिक मामला है। यह मात्र प्रचलन की बात है कि विभिन्न संविधानों ने समान मामलों में भाषा का किस प्रकार प्रयोग किया है। मेरा कहना है कि हमने जिस भाषा का प्रयोग किया है उसका प्रयोग करते समय फ्इस संविधान केय् वाक्यांश के बार-बार दोहराये जाने के संबंध में इसी प्रचलन का पालन किया गया है। मेरे मित्र श्रीमान् कामथ ने कहा है कि उन्होंने आस्ट्रेलिया तथा कुछ अन्य देशों के संविधानों की जाँच की है लेकिन उन्होंने इनमें इस वाक्यांश फ्इस संविधान केय् को नहीं पाया। मुझे दुख है कि उन्होंने अपने अनुसंधान में आइरिश संविधान को सम्मिलित नहीं किया। यदि उन्होंने इसकी जाँच की होती तो उन्होंने पाया होता कि प्रारुप संविधान में उसी वाक्य-रचना का प्रयोग किया गया है जो आइरिश संविधान में प्रयोग की गई है। संदर्भ के लिए, मैं उनका ध्यान आयरलैंड के संविधान के अनुच्छेद 19, अनुच्छेद 27, उपखण्ड (4), अनुच्छेद 32 और अनुच्छेद 46, उपखण्ड (5) की ओर आकृष्ट करना चाहूँगा जिनमें वह पायेंगे कि जहाँ कहीं भी फ्अनुच्छेदय् शब्द आया है उसके बाद ‘इस संविधान के’ वाक्यांश आता है। मैं श्रीमान् कामथ को यह भी बताता हूँ कि इस संदर्भ में हमने भारत सरकार अधिनियम, 1935 में प्रयुक्त वाक्य-रचना का भी अनुसरण किया है। मुझे खेद है कि भारत सरकार अधिनियम के सभी अनुच्छेदों की जाँच कने का समय नहीं था परंतु सौभाग्य से, मुझे एक अनुच्छेद 142 क मिला जिसमें इसी प्रकार की वाक्य-रचना का प्रयोग हुआ है। इसलिए जहाँ तक मेरे माननीय मित्र श्रीमान् नज़ीरुद्दीन अहमद द्वारा प्रस्तावित संशोधन के प्रथम भाग का संबंध है मेरा कहना है कि हमने सनकी की तरह काम नहीं किया है बल्कि हमने जिस वाक्य-रचना का प्रयोग किया है वही वाक्य-रचना अन्य देशों के संविधानों में भी शामिल है।
ऽ सी.ए.डी., (आधिकारिक प्रतिवेदन), अंक VII, 18 नवम्बर, 1948, पृष्ठ 467-468