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24 बाबा साहेब डा. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

उनके दूसरे संशोधन के संबंध में कि हमें फ्अनुच्छेदय् शब्द को फ्याय् शब्द के बाद दोहराना नहीं चाहिए और हमें फ्अनुच्छेद 2 या 3य् कहना चाहिए, मेरा फिर यही कहना है। यहाँ पुनः हमने जाने-माने संविधानों का अनुसरण किया है और यदि मेरे मित्र उनकी जाँच करेंगे तो वह पायेंगे कि उनमें भी समान वाक्य-रचना आती है। उनकी जानकारी के लिए, मैं उन्हें भारत सरकार अधिनियम के अनुच्छेद 69 के उपखण्ड (3) को देखने के लिए कहूँगा। उसमें प्रयुक्त शब्द फ्पैरा है। यह कहता है पैरा (ब) या पैरा (ड.)य्। इसलिए जहाँ तक सिद्धांत का संबंध है, यह बहस का विषय बिल्कुल नहीं हो सकता । यह केवल प्रचलन का मामला है और जो प्रश्न पूछा जाना चाहिए वह है - क्या हमने ऐसा कुछ कर दिया है जिसका प्रचलन नहीं है और मेरा यह कहना है कि हमने वाक्य-रचना के प्रयोग में जो कुछ भी किया है वह एक प्रचलन है और इसलिए किसी भी धारा, जैसा यह प्रारुप में है, पर कोई आपत्ति नहीं हो सकती।

श्रीमान् नज़ीरुद्दीन अहमद ः तब अनुच्छेद 4 की धारा (2) के बारे में क्या करें? मेरे विचार से धारा (2) में प्रारुप को स्पष्ट बनाने के लिए फ्इस संविधान केय् शब्दों के प्रयोग के लिए एक संक्षिप्त संशोधन टिप्पणी के तौर पर होना चाहिए।

श्रीमानउपाध्यक्ष ः एक संक्षिप्त संशोधन टिप्पणी के तौर पर स्वीकार करके हम एक खराब प्रचलन की शुरूआत नहीं कर सकते।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ः महोदय, मैं इसे स्वीकार नहीं कर सकता।

श्रीमान उपाध्यक्ष ् ः तब मैं एक के बाद एक संशोधनों को मतदान के लिए रखूँगा।

¹श्रीमान् नज़ीरुद्दीन के सभी संशोधन अस्वीकृत हुए और अनुच्छेद 4 की धारा (1) तथा धारा (2) संविधान का हिस्सा बन गयीं।ह्

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अनुच्छेद 28

ख्ऽ, श्रीमान् उपाध्यक्ष - .... अगला संशोधन, नं. 838, श्रीमान् कामथ के नाम पर है। क्या आप संशोधन नं. 838 का प्रस्ताव कर रहे हैं?

श्री एच.वी. कामथ - श्रीमान ् उपाध्यक्ष, मैं प्रस्ताव करता हूँ-

फ्कि भाग IV के तहत शीर्षक में शब्द फ्निदेशय् के लिए शब्द फ्मूलय् प्रतिस्थापित किया जाए।य्

महोदय, अपने मित्र माननीय डॉ. अम्बेडकर के विचारार्थ इस संशोधन का प्रस्ताव करते हुए मैं इसके लिए दो कारण प्रस्तुत करना चाहूँगा ......

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ऽ सी.ए.डी., (आधिकारिक प्रतिवेदन), अंक VII, 18 नवम्बर, 1948, पृष्ठ 474