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28 बाबा साहेब डा. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

ख्ऽ, माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर - श्रीमान् उपाध्यक्ष, मैं देख रहा हूँ कि संविधान के वास्तविक प्रावधानों के विषय में इस सदन के उन सदस्यों को बहुत अधिक गलतफहमी है जो इस प्रकार के निदेशात्मक सिद्धांतों में रुचि रखते हैं।

यह बिलकुल सम्भव है कि यह गलतफहमी या पर्याप्त समझ इस कारण से है कि मैंने स्वयं प्रस्ताव के समर्थन में अपने उद ् घाटन भाषण में प्रश्न के इस पहलू का जिक्र नहीं किया। यह इसलिए नहीं था कि इस मामले को सदन में स्पष्ट तरीके से रखने की मेरी इच्छा नहीं थी बल्कि इसलिए था कि मेरा भाषण वैसे ही इतना लम्बा हो गया था कि मैंने इसे पहले से और अधिक उबाऊ बनाने का जोखिम नहीं लेना चाहा_ लेकिन मैं यह वांछनीय समझता हूँ कि मुझे सदन के कुछ मिनट लेने चाहिए जिससे कि मैं यह स्पष्ट कर सकूँ कि संविधान में मूल स्थिति से मेरा क्या आशय है? जैसा मैंने कहा, हमारा संविधान एक क्रिया-विधि की तरह संसदीय लोकतंत्र को निर्धारित करता है। संसदीय लोकतंत्र से हमारा अभिप्राय एक व्यक्ति, एक वोट से है। हमारा यह भी अभिप्राय है कि प्रत्येक सरकार अपने दैनिक मामलों में तथा किसी निश्चित अवधि के बाद तब परीक्षा के लिए प्रस्तुत होगी जब मतदाताओं को सरकार के कार्यों का मूल्यांकन करने का अवसर दिया जायेगा। हमने इस संविधान में राजनीतिक लोकतंत्र क्यों स्थापित किया है? इसका कारण यह है कि हम किसी भी सूरत में हमेशा के लिए कुछ लोगों के किसी विशेष निकाय का अधिनायकवाद स्थापित नहीं करना चाहते। जबकि हमने राजनीतिक लोकतंत्र स्थापित किया है तो भी हमारी इच्छा है कि हमें अपना आदर्श आर्थिक लोकतंत्र भी निर्धारित करना चाहिए। हम मात्र एक ऐसी क्रिया-विधि निर्धारित क्यों नहीं करना चाहते जिसके जरिये लोग सत्ता हथियाते रहें। संविधान उन लोगों के सामने आदर्श भी निर्धारित करना चाहता है जो सरकार बनायेंगे और वह आदर्श आर्थिक लोकतंत्र है जिससे, जहाँ तक मेरा संबंध है, मेरा अभिप्राय ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ से है। प्रश्न है- क्या आर्थिक लोकतंत्र लाने के कई तरीके हैं जिनमें लोगों का विश्वास है_ कुछ लोगों का विश्वास है समाजवादी राज्य की स्थापना ही आर्थिक लोकतंत्र का सर्वोत्तम रूप है, तो कुछ लोग ऐसे भी हैं जो साम्यवादी विचार को आर्थिक लोकतंत्र का सर्वाधिक सही रूप मानते हैं।

अब, इस सच्चाई को मानते हुए कि ये विभिन्न तरीके हैं जिनसे आर्थिक लोकतंत्र लाया जा सकता है, हमने सोच-समझकर निदेशात्मक सिद्धांतों में प्रयुक्त भाषा में उसे अन्तर्विष्ट किया है जो निश्चित व दृढ़ नहीं है। विभिन्न प्रकार की सोच वाले लोगों के लिए आर्थिक लोकतंत्र के उद ् देश्य को पाने के निमित्त हमने काफी गुंजाइश छोड़ी है ताकि वे मतदाताओं को विश्वास दिला सकें कि आर्थिक लोकतंत्र तक पहुँचने का यही सर्वोत्तम रास्ता है।

ऽ सी.ए.डी. (आधिकारिक प्रतिवेदन), अंक VII, 22 नवम्बर, 1948, पृ. 494-95