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महोदय, यही कारण है कि भाग IV के अनुच्छेदों की भाषा इस प्रकार की रखी गयी है जैसी प्रारुप समिति ने उचित समझी। किसी ऐसी वस्तु को निश्चित, दृढ़ रूप देना लाभदायक नहीं है जो दृढ़ है ही नहीं_ जो मूलतः परिवर्तनशील है और जो परिस्थितियों तथा समय के अनुसार आवश्यक रूप से परिवर्तनशील रहेगी। इसलिए ऐसा कहने में कोई लाभ नहीं कि निदेशात्मक सिद्धांतों का कोई महत्व नहीं है। मेरे विचार में, निदेशात्मक सिद्धांतों का बहुत महत्व है क्योंकि वे यह निर्धारित करते हैं कि हमारा आदर्श आर्थिक लोकतंत्र है। क्योंकि हम संविधान की विभिन्न क्रिया-विधियों द्वारा मात्र ऐसी संसदीय सरकार नहीं चाहते थे जो आर्थिक लोकतंत्र के आदर्श के प्रति दिशाहीन हो और इसीलिए हमने सोच-समझकर इस संविधान में निदेशात्मक सिद्धांतों को शामिल किया। मेरे विचार से, यदि मेरे मित्र, जो इस विषय पर उत्तेजित हैं, इस पर ध्यान दें जो मैने अभी कहा कि हमारे इस संविधान को बनाने के वास्तव में दो उद ् देश्य हैं -- ( i ) राजनीतिक लोकतंत्र सुनिश्चित करना और ( ii ) यह सुनिश्चित करना कि आर्थिक लोकतंत्र हमारा आदर्श है और यह भी निर्धारित करना कि प्रत्येक सरकार, जैसी भी हो, आर्थिक लोकतंत्र लाने का प्रयत्न करेगी तो अधिकांश गलतफहमी जिससे अधिकतर सदस्य जूझ रहे हैं दूर हो जाएगी। मेरे मित्र श्रीमान् त्यागी ने मुझसे शब्द ‘स्ट्राइव’ और इस तरह के वाक्यांशों हो हटाने की गुजारिश की है। मैं समझता हूँ उन्होंने गलत समझा है कि हमने ‘स्ट्राइव’ क्यों प्रयुक्त किया है। शब्द ‘स्ट्राइव’ जो प्रारुप संविधान में आया है, मेरे विचार में, बहुत महत्वपूर्ण है। ऐसी परिस्थितियां हैं जो इसे निदेशात्मक सिद्धांतों को प्रभावी बनाने से रोकती हैं या इसके आड़े आती हैं, तो भी वे कठिन और प्रतिकूल परिस्थितियों में भी इन निदेशों को प्रभावी बनाने के लिए सदैव प्रयत्नशील रहेंगी। इसीलिए हमने शब्द ‘स्ट्राइव’ का प्रयोग किया है। अन्यथा किसी सरकार के लिए यह कहना आम हो जायेगा कि परिस्थितियां इतनी खराब हैं, वित्त इतना अपर्याप्त है कि हम इस दिशा में कुछ भी प्रयत्न नहीं कर सकते जिस दिशा में हमें संविधान करने को कहता है। मेरे विचार से मेरे मित्र श्रीमान् त्यागी समझ गये होंगे कि शब्द ‘स्ट्राइव’ इस संदर्भ में बड़े ही महत्व का है और इसे निकालना बहुत गलत होगा।
शेष संशोधनों के बारे में, मुझे डर है कि मुझे उनका विरोध करना पड़ेगा।
श्रीमान् उपाध्यक्ष ः केवल दो संशोधन प्रस्तावित किए गये हैं- मैं उन्हें मतदान के लिए रखता हूँ। पहला संशोधन नं. 863 श्री दामोदर स्वरूप सेठ के नाम में है।
संशोधन अस्वीकृत हुआ।
श्री एच.वी. कामथ ः महोदय मैं अपने संशोधन पर जोर नहीं दे रहा।
श्रीमान् उपाध्यक्ष ः अगला संशोधन नं. 867 श्रीमान् नज़ीरुद्दीन का है ....
संशोधन अस्वीकृत हुआ।