39
पूरा का पूरा क्षेत्र शामिल कर लिया है जो इस देश में समान संहिता द्वारा शामिल किया गया है। इसलिए यह प्रश्न पूछने के लिए अब बहुत देर हो चुकी है, कि क्या हम यह कर सकते हैं? जैसा मैं कहता हूँ, हम यह पहले ही कर चुके हैं।
संशोधनों पर आते हुए, मैं केवल दो टिप्पणियां करना चाहूँगा। मेरी पहली टिप्पणी यह होगी कि जिन सदस्यों ने इस संशोधनों को रखा है वे कहते हैं कि मुसलमानों का व्यक्तिगत कानून, जहाँ तक इस देश का संबंध है, अपरिवर्तनीय है और पूरे भारत में एक-सा है। अब मैं इस वक्तव्य को चुनौती देना चाहता हूँ। मेरे विचार से मेरे अधिकतर मित्र जो इस संशोधन पर बोले हैं वे यह बिल्कुल भूल गये हैं कि 1935 तक उत्तर-पश्चिमी सीमांत क्षेत्र पर शरीयत कानून लागू नहीं था। उत्तराधिकारी तथा अन्य मामलों में यह हिन्दू कानून का अनुसरण करता था, यहाँ तक कि 1939 में केन्द्रीय विधायिका को उत्तर-पश्चिमी सीमा के मुसलमानों पर लागू होने वाले हिन्दू कानून को समाप्त करने और उन पर शरीयत कानून को लागू करने के लिए इस क्षेत्र में आना पड़ा। इतना ही नही है। मेरे माननीय मित्र भूल गये हैं कि उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत के अलावा, शेष भारत में 1937 तक, विभिन्न हिस्सों, उदाहरणार्थ, संयुक्त प्रांत, केन्द्रीय प्रांत और बम्बई में मुसलमानों पर उत्तराधिकार के मामले में, हिन्दू कानून ही लागू होता था। उन दूसरे मुसलमानों की तुलना में, जो शरीयत कानून का पालत करते थे, इन्हें समान धरातल पर लाने के लिए विधायिका को 1937 में हस्तक्षेप करना पड़ा और शेष भारत में भी शरीयत कानून को लागू करना पड़ा।
मुझे मेरे मित्र श्री करुणाकर मेनन ने सूचित किया है कि उत्तरी मालबार में सभी पर, हिन्दू ही नहीं, मुसलमानों पर भी, मारूमक्कथ्यम कानून लागू होता था। यह याद करने योग्य है कि मारूमक्कथ्यम कानून एक मातृप्रधान कानून है, न कि पितृप्रधान।
इसलिए उत्तरी मालबार में मुसलमान अभी तक मारूमक्कथ्यम कानून का ही अनुसरण कर रहे थे। इसलिए यह कहना व्यर्थ है कि मुसलमानों का कानून अपरिवर्तनीय रहा है जिसका वे प्राचीन काल से अनुसरण कर रहे हैं। यह कानून अभी तक किन्हीं हिस्सों में लागू नहीं था और इसे दस वर्ष पूर्व ही लागू किया गया है। इसलिए यदि यह आवश्यक समझा गया कि एक समान नागरिक संहिता विकसित करने के लिए जो सभी नागरिकों पर, धर्म पर विचार किए बिना, लागू होती हो, हिन्दू कानून के कुछ हिस्से, इसलिए नहीं कि वे हिन्दू कानून के हिस्से थे बल्कि वे सबसे अधिक उपयुक्त थे, अनुच्छेद 35 द्वारा नमूने के तौर पर तैयार की गई नयी नागरिक संहिता में सम्मिलित कर लिए गये तो मुझे पूरा यकीन है कि किसी मुसलमान के लिए यह कहना ठीक नहीं होगा कि नागरिक संहिता को बनाने वालों ने मुस्लिम समुदाय की भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया है।
मेरी दूसरी टिप्पणी उन्हें विश्वास दिलाने के लिए है। मुझे इस मामले के प्रति उनकी भावनाओं का अहसास है, लेकिन, मेरे विचार से, उन्होंने अनुच्छेद 35 का कुछ अधिक ही अर्थ लगा लिया है जो केवल यह प्रस्तावित करता है कि राज्य देश के नागरिकों के