अनुच्छेद 37 - Page 55

40 बाबा साहेब डा. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

लिए एक नागरिक संहिता उपलब्ध कराने का प्रयास करेगा। वह यह नहीं कहता कि जब संहिता बन कर तैयार हो जाएगी उसके बाद राज्य इसे नागरिकों पर बलपूर्वक लागू करेगा, मात्र इसलिए कि वे नागरिक हैं। यह पूर्णतया सम्भव है कि भविष्य में संसद यह प्रावधान कर दे कि संहिता उन्हीं पर लागू होगी जो यह घोषणा करते हैं कि वे इसका पालन करने के लिए तैयार हैं, ताकि शुरुआत मे संहिता का लागू होना विशुद्ध रूप से ऐच्छिक होगा। संसद इस प्रकार के किसी तरीके से यह महसूस कर सकती है। यह एक नया तरीका नहीं है। यह शरीयत अधिनियम, 1937 में अपनाया गया था जब यह उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत के अलावा दूसरे क्षेत्रों पर लागू किया गया था। शरीयत कानून को मुसलमानों पर लागू करना चाहिए बशर्ते कि एक मुसलमान जो शरीयत अधिनियम से बँधना चाहता है, वह राज्य के अधिकारी के पास जाता है और घोषणा कर देता है उसके बाद कानून उसको तथा उसके उत्तराधिकारियों को इससे बाँध देगा। संसद के लिए यह बिल्कुल संभव होगा कि इस तरह का प्रावधान अन्तर्विष्ट करे ताकि जो आशंका मेरे मित्रों ने यहाँ व्यक्त की है वह पूर्णतया दूर हो जाए। इसलिए मै इसका विरोध करता हूँ।

¹मोहम्मद इस्माइल साहिब तथा बी. पोकर साहिब के प्रस्ताव अस्वीकृत हुए। अनुच्छेद 35 संविधान में जोड़ दिया गया।ह्

अनुच्छेद 37

ख्ऽ, सरदार हुकुम सिंह (पूर्वी पंजाब - सिख) ः श्रीमान् उपाध्यक्ष मैं प्रस्ताव करता हूँ-

फ्कि अनुच्छेद 37 में, शब्दों -अनुसूचित जाति’ के लिए शब्दों ‘किसी भी धर्म या वर्ग के पिछड़े समुदाय, को प्रतिस्थापित किया जाए।य्

महोदय, फ्अनुसूचित जातिय् यह प्रारुप संविधान के अनुच्छेद 303( w ) में भारत सरकार आदेश, 1936 (अनुसूचित जाति) में उल्लिखित जातियों के रूप में परिभाषित किया गया है। उस आदेश में अधिकांश जनजातियों, जातियों, उपजातियों का वर्णन है जिनमें बावरिया, चमार, चुहरा, बाल्मीकि, ओद, साँसी, सिरवीबन्द और रामदसिया शामिल हैं। उदाहरण के लिए, इसमें सिख रामदसियों, ओदों, बाल्मीकियों और चमारों की एक बड़ी संख्या है। वे उतने ही पिछड़े हैं जितने कि उनके दूसरे धर्म के भाई-बन्धु। लेकिन अभी तक ये सिख पिछड़ी जातियां अनुसूचित जातियों को मिलने वाले लाभों से वंचित रखी गयी हैं। इसका परिणाम है या बड़ी संख्या में धर्म परिवर्तन है या असंतोष। मैं अनुभव करता हूँ कि जहाँ तक विधायिका के चुनाव का संबंध है, यह कुछ हद तक तर्कसंगत हो सकता है क्योंकि सिखों का अलग से प्रतिनिधित्व है और अनुसूचित जातियों का सामान्य सीटों में से उनका अपना हिस्सा आरक्षित है। एस. गोपालसिंह खालसा का एक प्रसिद्ध मामला है जिन्हें किसी एक क्षेत्र से चुनाव लड़ने की तब तक अनुमति नहीं दी गई जब तक उन्होंने यह घोषित नहीं कर दिया कि