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# माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ः श्रीमान् उपाध्यक्ष, मैं प्रो. शिब्बनलाल सक्सेना का संशोधन स्वीकार करता हूँ जो आगे इस तरह से संशोधित किया गया है कि उनके संशोधन सूची IV के 86 नम्बर के शुरू में फ्औरय् शब्द के बाद ‘विशेषकर’ शब्द जोड़ा जाए।

श्री महावीर त्यागी ः मुझे वास्तव में समझ नहीं आता कि डॉ. अम्बेडकर इस संशोधन को कैसे स्वीकार कर सकते हैं जबकि मेरा संशोधन चर्चा के अधीन है।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ः महोदय, मैं प्रो. शिब्बनलाल सक्सेना के संशोधन द्वारा संशोधित श्रीमान् त्यागी का संशोधन करता हूँ।

(सदस्यगण हँस पड़ते हैं)

श्रीमान् उपाध्यक्ष ः श्रीमान् त्यागी अधिकारों के बड़े आग्रही हैं।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ः महोदय, यदि मैं ऐसा कह सकता हूँ, अधिकार वास्तव में मेरा है, क्योंकि मैने ही इस संशोधन को प्रारूपित किया है जिसका उन्होंने प्रस्ताव किया है। (फिर से हँसी छूट जाती है)

श्रीमान् उपाध्यक्ष - यह मामले पर नये ढंग से प्रकाश डालता है।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर -ः मैं नहीं समझता इस संशोधन को स्वीकारने में सदन को कोई कठिनाई होगी। इसके विरुद्ध दो बातें उठायी गयी हैं। एक प्रो. खांडेकर द्वारा है जो सभा में कोल्हापुर का प्रतिनिधित्व करते हैं। मुझे विश्वास है कि श्रीमान् खांडेकर ने इस सच्चाई का पर्याप्त रूप से आकलन नहीं किया है कि यह धारा 3स अनुच्छेद की धाराओं में से एक है जो नीति के निदेशात्मक सिद्धांतों को सूचीबद्ध करता है। इसलिए राज्य के लिए इस सिद्धांत पर कार्य करना अनिवार्य नहीं है। इस सिद्धांत पर काम करना, न करना और कब ऐसा करना राज्य और जनमत पर छोड़ दिया गया है। इसलिए, यदि राज्य सोचता है, कि निषेध लाने का समय नहीं आया है या यह इन निदेशात्मक सिद्धांतों के तहत, धीरे-धीरे या अंशतः लाया जा सकता है तो उसे ऐसा करने की पूरी आजादी है। इसलिए मैं नहीं सोचता कि इस मामले में हमें खेद करने की आवश्यकता है।

लेकिन, महोदय, मुझे अपने मित्र श्रीमान् जयपाल सिंह द्वारा दिये गये भाषण पर काफी आश्चर्य हुआ। उन्होंने कहा कि इस मामले पर अभी चर्चा नहीं होनी चाहिए। बल्कि तब तक के लिए स्थगित कर देनी चाहिए जब हम जनजातीय क्षेत्रों पर सलाहकार समिति के प्रतिवेदन पर चर्चा करेंगे। यदि उन्होंने प्रारुप संविधान पढ़ा होता विशेषकर छठी अनुसूची का पैरा 12, तो उन्होंने पाया होता कि निषेध के विषय में जनजातीय लोगों की सुरक्षा के लिए व्यापक प्रावधान किया गया है। जनजातीय क्षेत्रों के संबंध में योजना यह है कि राज्य द्वारा, या तो प्रांत या फिर केन्द्र द्वारा, बनाया गया कानून स्वतः ही इस विशिष्ट क्षेत्र पर लागू नहीं होता। सर्वप्रथम, कानून बनाना होगा। दूसरे, इन क्षेत्रों में प्रशासन के उद ् देश्य हेतु संविधान के तहत स्थापित जिला परिषदों तथा क्षेत्रीय परिषदों को यह कहने की शक्ति दी गई है कि प्रांत या केन्द्र द्वारा बनाया गया विशेष कानून उस विशेष क्षेत्र पर लागू होना चाहिए या नहीं जिसमें जनजातीय लोग रहते हैं और निषेध से