48 बाबा साहेब डा. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
थी। दुर्भाग्य से, ब्रिटिश सरकार ने इस विशेष सिद्धांत को देश के प्रशासन में जोड़ने में प्रभावी नहीं किया। हमारे विचार से, समय आ चुका है जब यह सुधार कर दिया जाना चाहिए। निस्संदेह यह अनुभव किया गया है कि इस सुधार को कार्यान्वित करने में कुछ कठिनाइयाँ हैं, परिणामतः इस संशोधन ने दो विशेष मामलों पर विचार किया है जो कि कठिनाई से भरे हैं। एक यह है - हमने जान-बूझकर इसे मूल सिद्धांत का मामला नहीं बनाया, क्योंकि यदि हमने इसे मूल सिद्धांत का मामला बनाया होता तो संविधान के पारित होते ही कार्यपालिका तथा न्यायपालिका को अलग किया जाना पूर्णतया अनिवार्य हो जाता। इसलिए हमने निदेशात्मक सिद्धांतों से संबंधित अध्याय में, इस मामले को सोच-समझकर रखा और वहाँ भी हमने यह प्रावधान किया है कि यह सुधार तीन वर्षों के अन्दर किया जाएगा ताकि इस तरह के मामले में विलम्ब की कोई गुंजाइश न रहे। महोदय, मैं प्रस्ताव करता हूँ।
अनुच्छेद 39-क
ख्ऽ, श्रीमान् उपाध्यक्ष - (डॉ. एच.सी. मुखर्जी) ः एक संशोधन के बारे में डॉ. अम्बेडकर से नोटिस प्राप्त हुआ है। क्या आप अपना संशोधन प्रस्तावित करेंगे, डॉ. अम्बेडकर?
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर (बम्बई - जनरल) ः श्रीमान् उपाध्यक्ष मैं प्रस्ताव करता हूँ-
फ्कि अनुच्छेद 39-क में, शब्दों ‘इस संविधान के शुरू होने के तीन वर्ष के अन्तराल के अन्दर यह सुनिश्चित करने के लिए’ को निकाल दिया जाए तथा ‘कि कार्यपालिका से न्यायपालिका अलग है’ शब्दों के स्थान पर ‘न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग करने के लिए’ शब्द प्रतिस्थापित किए जाएं।य्
ताकि अनुच्छेद 39-क इस संशोधन के बाद इस प्रकार पढ़ा जाए-
फ्राज्य अपनी सार्वजनिक सेवाओं में न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग करने के लिए कदम उठायेगा।य्
सदन ध्यान देगा कि इस संशोधन का उद ् देश्य तीन वर्ष के अन्तराल को दूर करना है जिसका मूल अनुच्छेद 39-क में उल्लेख है। मैं यह संशोधन करने पर क्यों बाध्य हुआ इसके ये कारण हैं। सदन का एक भाग ऐसा है जो यह महसूस करता है कि इन निदेशात्मक सिद्धांतों में हमें अवधि और प्रक्रिया संबंधी मामलों का ब्यौरा नहीं जोड़ना चाहिए। इन निदेशात्मक सिद्धांतों को निरूपित करना चाहिए और इनके कार्यान्वित किए जाने के विस्तार में नहीं जाना चाहिए। यह पहला कारण है कि मैं महसूस करता हूँ कि तीन वर्ष का अन्तराल अनुच्छेद 39-क में से निकाल दिया जाना चाहिए।
ऽ सी.ए.डी., अंक VII, 25 नवम्बर, 1948, पृ. 585-86