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दूसरा कारण जिसकी वजह से मैं यह संशोधन करने के लिए मजबूर हुआ हूँ यह है शब्द ‘तीन वर्ष’ जिस पर सदन के कुछ सदस्यों में मतभेद है। कुछ का कहना है, यदि तीन वर्ष की अवधि दी जाती है तो कोई भी सरकार तीसरे वर्ष के शुरू होने से पहले कोई कदम नहीं उठायेगी। आप वास्तव में प्रांतों की विधायिका को अनुच्छेद में तीन वर्ष का उल्लेख करके तीन वर्ष तक कोई भी कदम न उठाने की अनुमति दे रहे हैं। दूसरा विचार यह है कि तीन वर्ष बहुत कम अवधि हो सकती है। यह भी हो सकता है जहाँ तक प्रांतों का संबंध है, जहाँ प्रशासनिक मशीनरी अच्छी तरह स्थापित है और जो बदली तथा संशोधित की जा सकती है ताकि उन्हें पृथक किया जा सके यह अवधि काफी लम्बी हो सकती है। लेकिन निदेशात्मक सिद्धांतों में प्रयुक्त ‘राज्य’ शब्द केवल प्रांतीय सरकारों को ही नहीं बल्कि भारतीय राज्यों की सरकारों को भी शामिल करता है। यह विवाद का विषय है कि भारतीय राज्यों मे प्रशासन लम्बे समय तक ऐसा नहीं हो सकता जिससे वांछनीय परिणाम प्राप्त किया जा सके। परिणामस्वरूप, तीन वर्ष का अन्तराल, जहाँ तक भारतीय राज्यों का संबंध है, अनदेखा नहीं किया जा सकता। इसलिए यह अनुच्छेद अपने उस उद ् देश्य में कामयाब होगा हम सभी ऐसा मानते हैं। यदि अनुच्छेद में राज्य (प्रांत और भारतीय राज्य दोनों ही) को निर्देश देते हुए केवल आदेशात्मक प्रावधान हो कि यह संविधान राज्य की सार्वजनिक सेवाओं में न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग करने का कर्त्तव्य इस इदादे के साथ निर्धारित करता है कि जहाँ सम्भव है ऐसा बिना देरी के तुरंत किया जायेगा, और जहाँ इस सिद्धांत का क्रियान्वयन तुरंत संभव नहीं है तो भी यह एक आवश्यक कर्त्तव्य स्वीकार किया जायेगा और जिसका विलम्बन इस संविधान के सिद्धांतों के तहत नहीं किया जायेगा। इसलिए मैं कहता हूँ कि जिस संशोधन का मैने प्रस्ताव किया है वह इस सदन के सभी दृष्टिकोणों से मेल खाता है और मैं आशा करता हूँ कि सदन इस संशोधन पर अपनी सहमति दे देगा।
प्रो. शिब्बनलाल सक्सेना (सयुंक्त प्रांत - जनरल) ः महोदय, डॉ. अम्बेडकर पहले ही एक संशोधन प्रस्तावित कर चुके हैं, वह है कि उन्होंने नया अनुच्छेद 39-क जोड़ा है। क्या किसी सदस्य को अपने संशोधन को स्वयं संशाधित करने की अनुमति है?
श्रीमान् उपाध्यक्ष ः हाँ। मैं आप से सब इस बात पर गौर करने का अनुरोध करता हूँ कि हमें मूल तत्वों के बारे में चर्चा करनी है, न कि तकनीकियों के बारे में।
श्री आर. के. सिधवा (सी.पी. और बेरार - जनरल) ः श्रीमान् उपाध्यक्ष, महोदय, मुझे बहुत खुशी है कि डॉ. अम्बेडकर ने यह संशोधन प्रस्तावित किया है और यह कि इस बाद की अवस्था में भी बेहतर मंत्रणायें और समझ व्याप्त रही-
प्रस्ताव स्वीकार हुआ।
अनुच्छेद 39-अ संविधान में जोड़ दिया गया।
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