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[♣] श्रीमान् उपाध्यक्ष ः मैं डॉ. अम्बेडकर से निवेदन करता हूँ कि वह हमें श्रीमान् अली बेग द्वारा उठायी गयी बातों से अवगत करायें। हम लोग अनजान हैं और हम उन्हें सुनना चाहेंगे।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः श्रीमान् उपाध्यक्ष, मुझे अवश्य स्वीकार कर लेना चाहिए कि, यद्यपि मैंने अपने मित्र के भाषण पर ध्यान दिया था जिन्होंने यह संशोधन प्रस्तावित किया तथापि मैं यह समझ नहीं पाया कि वास्तव मं वह क जानना चाहते थे? यदि वह अपने संशोधन के द्वारा पूरा का पूरा अनुच्छेद 7 निकालना चाहते हैं तो मैं बड़ी आसानी से उन्हें यह स्पष्ट कर सकता हूँ कि इस अनुच्छेद का संविधान में बने रहना क्यों आवश्यक है।
मूलाधिकारों के दो उददेश्य हैं। पहला, प्रत्येक नागरिक को इन अधिकारों पर दावा करने ् की स्थिति में अवश्य होना चाहिए। दूसरे, ये प्रत्येक प्राधिकारी पर बाध्यकर होने चाहिए- अब मैं यह स्पष्ट करूँगा कि फ्प्राधिकारीय् शब्द का क्या अर्थ है? -प्रत्येक ऐसा प्राधिकारी जिसके पास या तो कानून बनाने की शक्ति है या फिर विवेक का प्रयोग करने की शक्ति। इसलिए यह बिल्कुल स्पष्ट है कि यदि मूलाधिकारों को स्पष्ट रूप से बने रहना है तो उन्हें न केवल केन्द्र सरकार पर बाध्यकर होना चाहिए, न केवल प्रांतीय सरकार पर बाध्यकर होना चाहिए उन्हें न केवल भारतीय राज्यों में स्थापित सरकार पर बाध्याकरी होना चाहिए बल्कि उन्हें स्थानीय जिला बोर्ड, नगरपालिकाओं, ग्राम पंचायतों और तालुक बोर्डों, वास्तव में, ऐसे प्रत्येक प्राधिकारी जिसे कानून द्वारा उत्पन्न किया गया है और जिसे कानून बनाने, नियम बनाने, या उपकानून बनाने की कोई शक्ति प्राप्त है, पर भी बाध्यकर होना चाहिए।
यदि यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया जाता है - और मैं नही समझता कि कोई सदस्य जो मूलाधिकारों की परवाह करता है, वह कानून द्वारा उत्पन्न किए गये प्रत्येक प्राधिकारी पर इस प्रकार के सर्वसार्विक कर्त्तव्य को निर्धारित करने पर आपत्ति कर सकता है- तब हमें अपना इरादा स्पष्ट करने के लिए क्या करना है? ऐसा करने के दो तरीके हैं। एक तरीका संयुक्त वाक्यांश जैसे- फ्दि स्टेटय् का प्रयोग करना है जैसा हमने अनुच्छेद 7 में किया है_ या फ्केन्द्र सरकार, प्रांत सरकार, राज्य सरकार, नगरपालिका, स्थानीय बोर्ड या कोई अन्य प्राधिकारी जैसी वाक्या-रचना को बार-बार दोहराते रह जाएं। हर बार इस वाक्य-रचना को दोहराना मुझे न केवल सबसे अधिक बोझिल लगता है बल्कि मूर्खतापूर्ण भी लगता है। सबसे बुद्धिमानी वाली बात इस संयुक्त वाक्यांश का प्रयोग करना और कम से कम शब्दों का प्रयोग करना होगा। मैं आशा करता हूँ कि मेरे मित्र अब समझ जाएंगे कि हमने इसलिए ‘राज्य’ शब्द का इस अनुच्छेद में प्रयोग किया है और इसलिए इस अनुच्छेद को संविधान में अवश्य बने रहना है।
श्रीमान् उपाध्यक्ष ः मैं अब इस संशोधन को मतदान के लिए रखूँगा। सर्वप्रथम हमारे पास श्रीमान् नज़ीरुद्दीन का संशोधन नं. 21 है जो संशोधन नं. 246 में एक संशोधन है।
♣ सी.ए.डी. (आधिकारिक प्रतिवेदन), अंक VII, 25 नवम्बर, 1948,, पृ. 610