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फ्जब तक कि संदर्भ को अन्य प्रकार की अभिव्यक्ति की जरूरत नहीं पड़तीय् ताकि अनुच्छेद इस प्रकार पढ़ा जाएगा-
‘इस अनुच्छेद में जब तक कि संदर्भ को अन्य प्रकार की अभिव्यक्ति की जरूरत नहीं पड़ती-
(क) अभिव्यक्ति ‘कानून’ में ऐसा कोई भी अध्यादेश, आदेश, उपकानून, नियम,
नियमन, अधिसूचना, रिवाज या लोकाचार शामिल है जो भारत के क्षेत्र या
इसके किसी भाग में कानून की शक्ति रखता है।
(ख) अभिव्यक्ति फ्लागू कानूनय् में वे कानून शामिल है जो भारत के क्षेत्र में
किसी विधायिका या अन्य सक्षम प्राधिकारी द्वारा इस संविधान के शुरू होने
से पहले पारित किए या बनाये गये हैं और जो पहले समाप्त नहीं किए गये
भले ही ऐसा कोई कानून या उसका कोई हिस्सा तब कतई अथवा विशेष
क्षेत्रों में अमल में न रहा हो।य्
मुझे पूरा पढ़ने की आवश्यकता नहीं है।
इसलिए, यदि अनच्छेद 8(1) में संदर्भ को ‘कानून’ शब्द में रिवाज को भी शामिल करके प्रयोग करने की जरूरत है, तो ऐसी रचना सम्भव होगी। अनुच्छेद 8 की उपधारा (2) के संदर्भ में ‘कानून’ शब्द में रिवाज शामिल करके पढ़ना आवश्यक नहीं है और यह सम्भव भी नहीं होगा। मेरे विचार से अब वह कठिनाई दूर हो जाएगी जिसकी तरफ मेरे मित्र ने अपने संशोधन में संकेत किया है।
श्रीमान् उपाध्यक्ष ः मैं, एक के बाद एक, संशोधनों को मतदान के लिए रखूँगा। मैं संशोधनों की संख्याएँ पुरानी सूची से पढ़ रहा हूँ .....
मैं संशोधन नं. 252 जो मजबूब अली बेग के नाम में है, मतदान के लिए रखता हूँ। प्रश्न है -
फ्कि अनुच्छेद 8 की धारा (2) में प्रतिबंध को निकाल दिया जाए ।य्
संशोधन अपना लिया गया।
¹संशोधन संख्या 259 जो श्री लोकनाथ मिश्रा के नाम में था, अस्वीकृत हुआ।ह्
ऽ ऽ ऽ ऽ
ख्ऽ, श्रीमान् उपाध्यक्ष ः तब मैं संशोधन सं. 260 जैसा डॉ. अम्बेडकर द्वारा संशाधित किया गया, को रखता हूँ। प्रश्न है-
फ्कि अनुच्छेद 8 की धारा (3) के लिए, अधोलिखित को प्रतिस्थापित किया जाए -
‘(3) इस अनुच्छेद में जब तक कि संदर्भ को अन्य प्रकार की अभिव्यक्ति की जरूरत नहीं पड़ती-
ऽ सी.ए.डी., अंक VII, 29 नवम्बर, 1948, पृ. 645