अनुच्छेद 9 - Page 76

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श्रीमान् गुप्तनाथ सिंह द्वारा प्रस्तावित संशोधन सं. 303 के संबंध में, मैं इसे स्वीकार करने के लिए तैयार हूँ बशर्ते कि वे अपने संशोधन में से शब्द फ्कुण्डोंय् निकालने के लिए तैयार हों।

श्री गुप्तनाथ सिंह ः महोदय, मैं यह पहले ही कर चुका हूँ।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ः तब बहुत से संशोधनों में से जिन्हें मैं स्वीकार नहीं कर सकता उनके लिए मुझे खेद है। मेरे विचार से उनमें से दो के बारे मे मेरे लिए कुछ कहना आवश्यक है। एक श्रीमान् ताहिर द्वारा प्रस्तावित संशोधन है जो यह माँग करता है कि अनुच्छेद 9 में निहित प्रावधानों का किसी भी प्रकार से उल्लंघन का अपराध कानून द्वारा दंडनीय बना दिया जाना चाहिए। मेरे मित्र श्रीमान् ताहिर, जिन्होंने यह संशोधन प्रस्तावित किया, ने विशेषकर अछूतों की स्थिति का हवाला दिया और कहा कि इन कार्यों के संबंध में जो अछूतों को जो आम जनता द्वारा उपयोग की जाने वाली सुविधाओं का समान रूप से उपयोग करने से रोकते हैं, हम अपने उद ् देश्य की पूर्ति में तब तक सफल नहीं हो सकते जब तक इन कृत्यों को अपराध नहीं ठहराया जाता। इसमें संदेह नहीं है कि उनके और इस सदन के अन्य सदस्यों के बीच इस मामले में कोई मतभेद नहीं है क्योंकि हम सब चाहते हैं कि दूसरी जातियों के सदस्यों की भांति किसी के द्वारा बाधा डाले बिना इस अभागे वर्ग को भी इन सुविधाओं के उपयोग का अधिकार होना चाहिए। लेकिन वे देखेंगे कि यह उद ् देश्य अनुच्छेद 11 में अंतर्विष्ट प्रावधानों द्वारा बिल्कुल पूरा होता है जो विशेषतया अस्पृश्यता से संबंधित है- इसे अपराध घोषित किए जाने के लिए संसद या राज्य पर छोड़ने के बजाय यह अनुच्छेद स्वयं घोषणा करता है कि उनके अधिकारों में इस तरह का कोई भी हस्ताक्षेप कानून के तहत दंडनीय अपराध माना जायेगा। यदि उनका विचार यह है कि सामान्यतया उन कृत्यों, जो अनुच्छेद 9 में अंतर्विष्ट प्रावधानों में हस्तक्षेप करते हैं, से संबंधित एक प्रावधान संविधान में होना चाहिए तो मैं उनका ध्यान संविधान के अनुच्छेद 27 की ओर आकृष्ट करना चाहूँगा जो संसद के लिए इस प्रकार के हस्तक्षेपों को कानून के तहत अपराध घोषित करने के लिए कानून बनाने का कर्त्तव्य निर्धारित करता है। इस प्रकार की शक्ति संसद को क्यों दी गई है इसका कारण है क्योंकि यह महसूस किया गया कि कोई भी अपराध जो मूलाधिकारों से संबंधित है वह पूरे भारत के क्षेत्र में समान होना चाहिए और ऐसी स्थिति तब नहीं होती जब यह शक्ति विभिन्न राज्यों और प्रांतों को उनकी इच्छानुसार नियमित किए जाने के लिए दे दी गयी होती। इसलिए मेरा कहना यह है कि जहाँ तक इस बात का संबंध है संविधान में पर्याप्त प्रावधान है और इससे अधिक की वास्तव में आवश्यकता नहीं है।

प्रो. के.टी. शाह द्वारा प्रस्तावित संशोधन सं. 323 के संबंध में, जिसका उद ् देश्य स्त्रियों और बच्चों के साथ ‘अनुसूचित जाति’ और ‘अनुसूचित जनजाति’ को जोड़ना है, मुझे डर है कि इसका ठीक प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।