62 बाबा साहेब डा. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
उद ् देश्य जो हम सब के मस्तिष्क में है वह है कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को आम जनता से अलग नहीं करना चाहिए।
उदाहरणार्थ, मेरे विचार से हममें से कोई भी नहीं चाहेगा कि अनुसूचित जाति के लिए एक आम विद्यालय खोला जाए जबकि गाँव में पूरे समाज के लिए एक आम विद्यालय खुला है। यदि ये शब्द जोड़े जाते हैं तो इससे राज्य को यह कहने का अवसर मिल जाएगा, फ्हम अनुसूचित जातियों के लिए विशेष प्रावधान कर रहे हैं।य् मेरे विचार से इस अनुच्छेद के तहत शरण लेते हुए वे निश्चित रूप से ऐसा कर सकते हैं यदि इस अनुच्छेद को इस तरीके से संशोधित किया जाता है जैसा प्रोफेसर चाहते हैं। इसलिए मेरे विचार से यह एक वांछनीय संशोधन नहीं है।
इसके बाद, मैं अपने मित्र श्रीमान् नागप्पा के बारे में कहता हूँ। उन्होंने मुझसे इस अनुच्छेद में प्रयुक्त कुछ शब्दों को स्पष्ट करने की माँग की है। उनका पहला प्रश्न था कि क्या फ्दुकानय् मे लौंड्री और हजामती सैलून भी शामिल हैं? जहांँ तक मेरा संबंध है मुझे तनिक भी संदेह नहीं है कि शब्द में लौंड्री और हजामत का स्थान शामिल है। ‘दुकान’ शब्द को सबसे सामान्य शब्दों में परिभाषित करने के लिए जो कहने की सोच सकता है वह यह है कि ‘दुकान’ एक ऐसा स्थान है जहाँ मालिक अपनी सेवा पेश करने के लिए तैयार है और कोई भी जो उसकी सेवा चाहता है ले सकता है । इसलिए ‘ लौंड्रीमैन’ एक ऐसा व्यक्ति होगा जो अपनी दुकान में जनता की विशेष ढंग से सेवा करने के लिए बैठा है अर्थात ् ग्राहकों के मैले कपड़े धोने के लिए। इसी प्रकार हजामती सैलून का मालिक किसी भी ऐसे व्यक्ति को अपनी सेवा पेश करने के लिए वहाँ बैठा होगा जो सैलून मे प्रवेश करता है।
माननीय श्री बी.जी. खेर (बम्बई - जनरल) ः क्या इसमें डॉक्टर और वकील के कार्यालय भी शामिल हैं?
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ः निश्चित रूप से इसमें ऐसा कोई भी शामिल नहीं होगा जो अपनी सेवाओं को पेश करता है। मैं व्यापक अर्थ में इसका प्रयोग कर रहा हूँ। इसलिए मैं यह बताना चाहूँगा कि यहाँ प्रयुक्त शब्द ‘दुकान’ सीमित अर्थ में प्रयुक्त नहीं किया गया है। यह सेवाओं की मांग, जब सेवा की शर्तों पर सहमति हो चुकी है, के व्यापक अर्थ में प्रयुक्त हुआ है।
दूसरा प्रश्न जो मेरे सामने रखा गया वह था कि क्या ‘सार्वजनिक शरण का स्थान’ में कब्रिस्तान भी शामिल है? मुझे सोच लेना चाहिए था कि बहुत कम लोगों की कब्रिस्तानों में रूचि होगी क्योंकि कोई भी यह जानने की परवाह नहीं करेगा कि मृत्यु के पश्चात् उसका क्या होता है? लेकिन, चूँकि मेरे मित्र श्रीमान् नागप्पा की इस बात मे रुचि है इसलिए मुझे कहना चाहिए कि मुझे कोई संदेह नहीं है कि एक सार्वजनिक शरण के स्थान में ऐसा कब्रिस्तान भी शामिल होगा जो पूर्णतया या अंशतः सार्वजनिक कोष के द्वारा कायम है। जहाँ ऐसे कब्रिस्तान नहीं हैं जो नगरपालिका, स्थानीय बोर्ड या तालुका