64 बाबा साहेब डा. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
श्री महावीर त्यागी ः मैं जानकारी चाहता हूँ। मैं आपके निर्णय या अधिकार के बारे में विवाद नहीं कर रहा। मैं केवल यह जानना चाहता हूँ कि उन संशोधनों के संबंध में सदन की संवेदनाओं को स्थान दिया जायेगा या नहीं जो निकाल दिये गये हैं अथवा कि क्या इन संशोधनों पर प्रारुप समिति या कोई अन्य निकाय विचार करेगा? मेरा सुझाव यह है कि आप सदन का भला करेंगे यदि आप कृपया एक उपसमिति नियुक्त कर दें जो इन शाब्दिक संशोधनों का अध्ययन करेगी और पता लगायेगी कि उनमें से कुछ का कम से कम संबंधित धारा के अर्थ में परिवर्तन लाने का उददेश्य है या नहीं। आपने जो कहा मैं उस पर ् विवाद नहीं करता। वे अनुचित हैं क्योंकि उनके बारे में आपने ऐसा फैसला किया है। परंतु अर्द्धविरामों, और पूर्णविरामों का भी कुछ महत्व होता है। मेरा आग्रह मात्र यह है ...
श्रीमान् उपाध्यक्ष ः क्या मैं एक बेहतर तरीका सुझा सकता हूँ जो शायद आपको पसन्द आ जाए, एक ऐसा तरीका जो उपसमिति की नियुक्ति से बेहतर है? उन्हें जिन्हें लगता है कि उनके संशोधन किसी महत्व के हैं वे खुद सीधे प्रारुप समिति के पास पहुँच सकते हैं। यदि वे ऐसा करते हैं तो मुझे यकीन है कि उन पर समुचित विचार किया जाएगा।
श्री महावीर त्यागी ः महोदय, अब मैं संतुष्ट हूँ।
श्रीमान् मोहम्मद ताहिर ः क्योंकि माननीय डॉ. अम्बेडकर ने संशोधन 315 के संबंध में मेरी बातों का जवाब देकर मुझे संतुष्ट कर दिया है, मैं इसे वापस लेने की अनुमति माँगता हूँ।
संशोधन, सदन की अनुमति से, वापस ले लिया गया।
श्रीमान् उपाध्यक्ष ः अब मैं बचे हुए संशोधनों को सदन में मतदान के लिए रखूँगा। डॉ. अम्बेडकर ने प्रथम संशोधन स्वीकार कर लिया है।
¹अधोलिखित अनुच्छेदों को डॉ. अम्बेडकर के सुझाव के अनुसार अपना लिया गया।ह्
(1) कि संशोधनों की सूची में संशोधन नं. 276 के लिए अधोलिखित को प्रतिस्थापित किया जाए-
‘कि अनुच्छेद 9 की धारा (1) के दूसरे पैरे को नयी धारा (1-अ) के रूप में अंकित किया जाए और इस तरह बनी नयी धारा में से शब्द ‘विशेषकर’ निकाल दिया जाए।’
ऽ ऽ ऽ ऽ
श्रीमान् उपाध्यक्ष ः अगला नं. 280 है, जिसे, मैं समझता हूँ, डॉ. अम्बेडकर ने स्वीकार कर लिया है। प्रश्न है-
(2) सं. 280-
फ्कि अनुचछेद 9 में ‘लिंग’ शब्द जहाँ कहीं भी आता है उसके बाद शब्द ‘जन्म स्थान’ अत्तर्विष्ट किए जाएँ।य्
(3) सं. 286 (श्रीमान् सुब्रहमण्यम)