अनुच्छेद 10 - Page 83

68 बाबा साहेब डा. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

ख्ऽ, माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ः श्रीमान् उपाध्यक्ष, महोदय, मैं शुरू से ही कह रहा हूँ, इससे पहले कि विशेष प्रश्नों पर विचार करूँ जो बहस के दौरान उठाये गये हैं, कि मैं श्रीमान् मिश्रा द्वारा प्रस्तावित संशोधन सं. 334 स्वीकार नहीं कर सकता, और न ही मैं अपने मित्र नज़ीरुद ् दीन अहमद द्वारा प्रस्तावित दो संशोधन सं. 336 और नं. 337 स्वीकार कर सकता हूँ। मैं श्रीमान् इमाम का संशोधन सं. 338 जैसा श्रीमान् अनन्तशयमन आयंगर द्वारा प्रस्तावित संशोधन सं. 77 द्वारा संशोधित किया गया, स्वीकार करने के लिए तैयार हूँ। मैं श्रीमान् कपूर का संशोधन सं. 340, जैसा मेरे मित्र श्रीमान् मुंशी और श्रीमान् अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यर द्वारा प्रस्तावित संशोधनों, सं. 81 और सं. 82 द्वारा संशोधित किया गया भी स्वीकार करने के लिए तैयार हूँ। मेरे विचार से मुझसे संशोधन सं. 334, 336 और 337 के बारे में कुछ भी कहने की मांग नहीं की गयी है। जो टिप्पणियां मैं अपने भाषण के दौरान करूँगा, वे निवास के प्रश्न जिसके बारे में इतनी अधिक बहस हो चुकी है और अनुच्छेद 10 की धारा (3) में ‘पिछड़ा’ शब्द के प्रयोग तक सीमित होंगी। मेरे मित्र श्रीमान् टी.टी. कृष्णमाचारी ने प्रारुप समिति पर व्यंग्य किया है कि प्रारुप समिति ने सम्भवतया अपने कुछ सदस्यों के हितों में एक संविधान प्रस्तुत करने के स्थान पर अधिवक्ताओं के लिए एक स्वर्ग तैयार कर दिया है। मैं यह कहने के लिए तैयार नहीं हूँ कि यह संविधान ऐसे प्रश्नों को जन्म नहीं देगा जिनके लिए कानूनी व्याख्या या अदालती व्याख्या आवश्यक होगी। वास्तव में, मैं श्री कृष्णमाचारी से पूछना चाहूँगा कि क्या वह विश्व के एक भी ऐसे संविधान का उदाहरण दे सकेंगे जो अधिवक्ताओं के लिए स्वर्ग न हो? मैं उनसे विशेषकर संयुक्त राज्य, कनाडा और अन्य देशों के संविधानों से संबंधित कानूनी प्रतिवेदनों के विशाल भंडारगृह को देखने के लिए कहूँगा। इसलिए मुझे इस बारे में कोई शर्मिंदगी नहीं है यदि यह संविधान व्याख्या के उद ् देश्य हेतु यहाँ से संघीय अदालत में ले जाया जाता है। प्रत्येक संविधान और प्रत्येक प्रारुप समिति का यही हश्र है। इसलिए मैं इस विषय को और कतई नहीं खीचूँगा।

अब, निवास के संबंध में। मामला वास्तव में बहुत सरल है और मैं नहीं समझ पा रहा कि मेरे मित्र श्रीमान् टी.टी. कृष्णमाचारी जैसे बुद्धिमान व्यक्ति इस संशोधन का मूल उद ् देश्य क्यों नही समझ सके।

श्रीमान् टी.टी. कृष्णमाचारी ः इसका भी वही कारण है जिस कारण मेरे माननीय मित्र इस शब्द को मूल अनुच्छेद में नहीं रख पाये।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ः मैं पूरी तरह नहीं समझ पाया। मैं इस संशोधन के उद ् देश्य को स्पष्ट करूँगा। इस सदन में बहुत से व्यक्ति यह महसूस करते हैं कि, जब हमने भारतीय राज्यों और प्रांतों के स्थानीय न्याय क्षेत्र की परवाह किए बिना पूरे भारत में एक साझा नागरिकता स्थापित की है यह केवल सहवर्ती है कि किसी विशेष

ऽ सी.ए.डी., अंक VII, 30 नवम्बर, 1948, पृ. 699-702