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राज्य में विशेष पद पर बने रहने के लिए निवास-स्थान की अनिवार्यता नहीं होनी चाहिए क्योंकि, यदि निवास-स्थान को आप योग्यता बना देते हैं तो आप वास्तव में उस साझा नागरिकता के महत्व को कम कर रहे हैं जो हमने इस संविधान द्वारा स्थापित की है अथवा जिसका इस संविधान के द्वारा स्थापित करने का प्रस्ताव करते हैं। इसलिए मेरे फैसले से, यह तर्क कि किसी राज्य में पदों पर कार्य करने के लिए निवास-स्थान एक योग्यता नहीं होनी चाहिए पूर्णतया वैध है और एक मजबूत तर्क है। साथ ही, यह भी अवश्य महसूस करना चाहिए कि आप उन लोगों को जो एक प्रांत से दूसरे प्रांत में, एक राज्य से दूसरे राज्य में पक्षी की भांति किसी स्थायित्व के, उस विशेष प्रांत से किसी संबंध के बगैर विचरण करते रहें, इसकी अनुमति नहीं दे सकते कि वे आयें, पदों के लिए आवेदन करें, पंख फैलाकर चलते बनें। इसलिए कुछ पाबन्दियां जरूरी हैं। जब इस मामले की जांच की गई, तो यह पाया गया कि आज बहुत से प्रांतों में प्रांतीय सरकारों के द्वारा उस विशेष प्रांत में एक पद के लिए एक निश्चित अवधि के निवास को बतौर योग्यता निर्धारित करते हुए नियम बना दिए गए हैं। इसलिए संशोधन में यह प्रस्ताव कि, यद्यपि साझा नियम के बतौर निवास एक योग्यता नहीं होनी चाहिए तथापि कुछ अपवाद बनाये जा सकते हैं, पर उसे आम नियम नहीं बनाया जा सकता। हम मात्र एक प्रचलन का अनुसरण कर रहे हैं जो विभिन्न प्रांतों में पहले ही स्थापित हो चुका है। हालाँकि, हमने पाया वह, यह था कि जबकि विभिन्न प्रांत एक निश्चित अवधि निर्धारित कर रहे थे तब भी यह अवधि भिन्न थीं। कुछ प्रांतों ने कहा कि व्यक्ति को वास्तव में आवश्यक रूप से अधिवासी होना चाहिए। इसके क्या अर्थ है? कोई नहीं जानता? कुछ ने दस वर्ष और कुछ ने सात वर्ष आदि या कुछ और प्रावधान रखा। इसलिए यह महसूस किया गया कि, जबकि योग्यता की परीक्षा के लिए एक अवधि तय करना वांछनीय हो सकता है लेकिन यह परीक्षा पूरे भारत में एक-सी होनी चाहिए। परिणामस्वरूप, यदि उद ् देश्य योग्यता की अवधि को समान बनाना हो, तो इसे केवल संसद को शक्ति देकर ही प्राप्त किया जा सकता है, न कि स्थानीय इकाइयों को शक्ति देकर, चाहे वे प्रांत हों या राज्य। इस संशोधन, जो निवास को बतौर योग्यता रख रहा है, का यही उद ् देश्य है।
मेरे मित्र श्रीमान् कामथ के द्वारा उठाये गये विषय के बारे में, मैं इस पर विचार करने का प्रस्ताव नहीं करता क्योंकि इस पर श्रीमान् मुंशी व अन्य मित्र द्वारा पहले ही विचार किया जा चुका है। उन्होंने उन्हें बता दिया है कि इस अनुच्छेद की भाषा इस संविधान के अन्य प्रावधानों के पूर्णतया अनुरूप है।
अब, महोदय दूसरे प्रश्न पर आने के लिए जो इस सदन के सदस्यों को आन्दोलित कर रहा है, अर्थात ् अनुच्छेद 10 की धारा (3) ‘पिछड़ा’ शब्द का प्रयोग, मैं अपने सामान्य अवलोकनों के साथ शुरू करना चाहूँगा ताकि सदस्य इस विशेष धारा में प्रयुक्त ‘पिछड़ा’ शब्द के अर्थ, महत्व और आवश्यकता को समझने की स्थिति में हो सकें। यदि सदस्य इस विषय पर कोशिश करें और अपने विचारों का आदान-प्रदान करें तो वे पायेंगे कि