अनुच्छेद 10 - Page 85

70 बाबा साहेब डा. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

हमारे सामने इस संबंध में तीन दृष्टिकोण हैं, और यदि हम एक ऐसा कारगर सिद्धांत प्रस्तुत करना चाहते हैं जो सर्वमान्य हो तो हमें इनमें सामंजस्य बिठाने की आवश्यकता होगी। इन तीन दृष्टिकोणों में से एक पहला यह है कि सभी नागरिकों के लिए अवसरों की समानता होगी। यह इस सदन के अधिकतर सदस्यों की इच्छा है कि प्रत्येक व्यक्ति जो उस विशेष पद के लिए योग्य है, उसे उस पद के लिए आवेदन करने, परीक्षा में बैठने, ताकि वह यह तय कर सके कि वह इसके योग्य है या नहीं, की स्वतंत्रता होनी चाहिए और कोई पाबंदी नहीं होनी चाहिए। एक अन्य विचार जिस पर सदन का एक लागू होने में कोई बाधा नहीं होनी चाहिए। एक अन्य विचार जिस पर सदन का एक भाग सहमत है वह यह, कि यदि इस सिद्धांत को अमल में लाना है - और उनके विचार में इसे पूरी तरह से अमल में लाना चाहिए - तो जहाँ तक लोक सेवाओं का संबंध है किसी भी वर्ग या जाति के लिए किसी भी प्रकार को आरक्षण नहीं होना चाहिए और सभी नागरिकों को, यदि वे योग्य हैं, समानता के समान धरातल पर रखा जाना चाहिए। यह दूसरा दृष्टिकोण है जो हमारे पास है। उसके बाद हमारे पास प्रभावशाली राय है जो यह आग्रह करती है कि, यद्यपि सैद्धांतिक रूप से अवसरों की समानता के सिद्धांत को अपनाना ठीक है तथापि इसी के साथ उन जातियों के प्रशासन में प्रवेश के लिए प्रावधान अवश्य करना चाहिए जो अभी तक प्रशासन से बाहर रही है। जैसा मैने कहा, प्रारुप समिति को ऐसा सूत्र तैयार करना पड़ा जो इन तीनों दृष्टिकोणों में सामंजस्य स्थापित कर सके, पहला, कि अवसरों की समानता होगी, दूसरा, कि कुछ विशेष समुदायों के पक्ष में आरक्षण होगा जिनका प्रशासन में अभी तक उचित प्रतिनिधत्व नहीं है। यदि माननीय सदस्य इन तथ्यों को ध्यान में रखेंगे - तीन सिद्धांत जिनमें हमें सामंजस्य स्थापित करना पड़ा - तो वे देखेंगे कि जो सूत्र अनुच्छेद 10 की धारा (3) में अंतर्ष्विट है उससे बेहतर और कोई सूत्र तैयार नहीं किया जा सकता था, वे पायेंगे कि उनका विचार जो यह विश्वास करते हैं और मानते हैं कि अवसरों की समानता होनी चाहिए अनुच्छेद 10 की धारा (1) में अंतर्विष्ट है। यह एक व्यापक सिद्धांत है। साथ ही, जैसा मैंने कहा, हमें कुछ जातियों की इस माँग पर इस सूत्र पर सहमत होना पड़ा कि जिस प्रशासन पर अब तक ऐतिहासिक कारणों के चलते एक या कुछ जातियों का नियंत्रण था, वह स्थिति अब समाप्त होनी चाहिए और दूसरी जातियों को लोक सेवाओं में आने का अवसर अवश्य ही मिलना चाहिए। उदाहरणार्थ, यह मान लें कि हमें उन जातियों की माँग पूर्णतया माननी पड़े, जो लोक सेवाओं में अब तक पूर्णतया नियुक्त नहीं किए गए हैं, तो वास्तव में जो होगा वह यह है हम पहले सिद्धांत को पूर्णतया नष्ट कर देंगे जिस पर हम सब सहमत हैं कि अवसरों की समानता होनी चाहिए। मुझे एक और दृष्टांत देने दें। उदाहरण के लिए, माने लें, 70 प्रतिशत पद एक जाति या कुछ जातियों के समूह के लिए आरक्षित कर दिए जाते हैं और केवल 30 प्रतिशत ही अनारक्षित रखें जाते हैं। कोई कहेगा कि 30 प्रतिशत पदों का आरक्षण बतौर सामान्य प्रतियोगिता उस पहले सिद्धांत अर्थात ् अवसरों की समानता होनी चाहिए, को प्रभावी बनाने की दृष्टि से संतोषप्रद है? मेरे विचार से यह नहीं हो सकता। इसलिए यदि पदों का आरक्षण अनुच्छेद 10 की उपधारा (1) के अनुसार होता है तो यह अल्पसंख्या