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में पदों तक सीमित होना चाहिए। केवल तब ही यह सिद्धांत संविधान में अपना स्थान पा सकता है और अमल मे प्रभावी हो सकता है। यदि माननीय सदस्य यह स्थिति समझते हैं कि अवसरों की समानात का सिद्धांत तथा उन जातियों की माँग को पूर करना जिनका राज्य में अभी प्रतिनिधित्व नहीं है, तो मुझे यकीन है कि वे इस बात पर सहमत होंगे कि जब तक आप अर्हकारी शब्द ‘पिछड़ा’ का प्रयोग नहीं करते तो जो अपवाद आरक्षण के पक्ष में है वह इस नियम को पूर्णतया नष्ट कर देगा। नियम जैसा कुछ नहीं बचेगा। यही, मेरे विचार से, यदि मैं ऐसा कह सकता हूँ, स्पष्टीकरण है जिस लिए प्रारुप समिति ने फ्पिछड़ाय् शब्द शामिल करने की जिम्मेवारी अपने ऊपर स्वयं ली और यह शब्द, मैं स्वीकार करता हूँ, कि यह उस रूप में मूलाधिकार में मौजूद नहीं था जिस रूप में सभा द्वारा पारित किया गया है। लेकिन मैं सोचता हूँ माननीय सदस्यों को अहसास हो जायेगा कि प्रारुप समिति जिसका विभिन्न आधारों पर जैसे कभी प्रारुप को अशुद्ध बताकर और कभी कुछ बताकर मजाक उड़ाया गया, जो कि सही नहीं था अपने ऊपर और अधिक प्रहार किए जाने का अवसर दे दिया होता कि उसने ऐसा प्रारुप संविधान तैयार किया जिसमें अपवाद इतना बड़ा था कि इसने नियम के लागू होने के लिए कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी। मेरे विचार से कि फ्पिछड़ाय् शब्द क्यों प्रयुक्त किया गया है, यह बताने के लिए इतना पर्याप्त है।
अल्पसंख्यकों के संबंध में, अनुच्छेद 296 में विशेष उल्लेख है जहाँ यह निर्धारित किया गया है कि अल्पसंख्यकों के संबंध में कुछ प्रावधान किया जायेगा। निस्संदेह, हमने आयाम निर्धारित नहीं किया। यह भाग में स्वयं स्पष्ट है, लेकिन अल्पसंख्यकों को उन पर विचार किए जाने से पूर्णतया नहीं निकाला है। किसी ने मुझसे पूछा था - फ्पिछड़ी जाति क्या है?य् तब कोई भी जो प्रारुप की भाषा पढ़ता है, स्वयं पता लेगा कि हमने यह प्रत्येक स्थानीय सरकार द्वारा तय किए जाने के लिए छोड़ दिया है। एक पिछड़ी जाति एक ऐसी जाति है जिसे सरकार पिछड़ा समझती है। मेरे माननीय मित्र श्रीमान् टी.टी. कृष्णमाचारी ने मुझसे पूछा था कि क्या यह नियम वाद योग्य होगा। इसका सैद्धांतिक उत्तर देना कुछ कठिन है। व्यक्तिगत रूप से मेरा मानना है कि यह वाद योग्य मामला है। यदि स्थानीय सरकार ने आरक्षण की इस श्रेणी में इतनी अधिक संख्या में सीटें शामिल कर ली हैं तो मैं समझता हूँ कोई भी संघीय अदालत या सर्वोच्च न्यायालय में जा सकता है और कह सकता है कि आरक्षण इतना अधिक है कि अवसरों की समानता का सिद्धांत नष्ट हो गया है और तब अदालत इस निष्कर्ष पर पहुँचेगी कि क्या स्थानीय सरकार या राज्य सरकार ने ठीक तथा विवेकपूर्ण ढंग से कार्य किया है। श्रीमान् कृष्णमाचारी ने पूछा था - फ्कौन ठीक व्यक्ति है और कौन विवेकी व्यक्ति है? ये तो वाद योग्य मामले हैं।य् निस्सदेह ये वाद योग्य मामले हैं, लेकिन मेरे माननीय मित्र श्रीमान् कृष्णमाचारी समझेंगे कि शब्द फ्सही व्यक्ति और विवेकी व्यक्तिय् बहुत से कानूनों में प्रयुक्त किए गए हैं और यदि वे केवल सम्पत्ति हस्तांतरण अधिनियम देख लें तो वे पायेंगे कि बहुत सारे मामलों में शब्द फ्सही व्यक्ति और विवेकी व्यक्तिय् बहुत अच्छी तरह से परिभाषित किए गए हैं और