अनुच्छेद 12 - Page 88

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महोदय, अनुच्छेद 12 की धारा (1) संशोधन के पश्चात ् इस प्रकार होगी -

फ्कोई उपाधि जो सैनिक या शैक्षिक विशिष्टता नहीं है राज्य द्वारा प्रदान नहीं की जाएगी।य्

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[#] माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ः महोदय, मैं अपने मित्र श्रीमान् टी.टी. कृष्णमाचारी द्वारा प्रस्तावित संशोधन को स्वीकार करता हूँ।

मेरे मित्र नज़ीरुद ् दीन अहमद द्वारा प्रस्तावित संशोधन के संबंध में, वे चाहते थे कि शब्दों ‘स्वीकार की’ को शब्दों ‘मान्यता प्रदान की’ से प्रतिस्थापित किया जाए। उनका तर्क था, मान लें कि नागरिक उपाधि स्वीकार कर ही लेता है तो संविधान में इस कार्य को निष्पभावी बनाने के लिए क्या दण्ड व्यवस्था है? इसके बारे में मेरा उत्तर बहुत ही सरल है - कि संविधान के तहत संसद को इसकी अवशिष्ट शक्तियों के तहत इस संदर्भ में ऐसा कानून बनाने की पूर्ण स्वतंत्रता होगी जो यह निर्धारित करेगा कि उस व्यक्ति के बारे में क्या किया जाना चाहिए जो इस अनुच्छेद के प्रावधानों के विपरीत उपाधि स्वीकार करता है। मुझे सोचना चाहिए था कि इस प्रकार के मामले का सामना करने के लिए यह पर्याप्त प्रावधान था। श्रीमान् कामथ की दूसरी बात के संबंध मे, यदि मैंने उन्हें सही समझा है, उन्होंने पूछा था कि क्या यह वाद योग्य अधिकार है?

इसके संबंध में मेरा जवाब बिल्कुल सरल है - यह वाद योग्य अधिकार नही है। उपाधियों को स्वीकार न करना नागरिकता के बने रहने की एक शर्त है_ यह एक अधिकार नहीं है, यह व्यक्ति के लिए निर्धारित किया गया एक कर्त्तव्य है कि यदि वह देश का नागरिक बना रहना चाहता है तो उसे कुछ शर्तों का पालन करना होगा जिनमें से एक यह है कि उसे उपाधि बिल्कुल भी स्वीकार नहीं करनी चाहिए क्योंकि संसद को यह कहने की आजादी होगी, जब संसद कानून के द्वारा व्यवस्था करती है कि उन व्यक्तियों के बारे में क्या किया जाना चाहिए जो इस संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन करते हैं, कि यदि कोई व्यक्ति अनुच्छेद 12(1) या (2) के प्रावधानों के विपरीत कोई उपाधि स्वीकार करता है तो उसे कुछ दण्ड दिये जा सकते हैं। एक दण्ड यह हो सकता है कि वह अपना नागरिकता का अधिकार खो दे। इसलिए, इस प्रावधान को समझने में कोई वास्तविक कठिनाई नहीं है, क्योंकि यह स्वयं नागरिकता से जुड़ी एक शर्त है, कि यह वाद योग्य अधिकार नहीं है।

श्री एच.वी. कामथ ः मैं दी गई उपाधियों को राज्य द्वारा मान्यता प्रदान करने की बात कर रहा हूँ।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ः जैसा मैंने अपने मित्र श्रीमान् नज़ीरुद ् दीन को उत्तर देते हुए कहा, यह संसद पर निर्भर करता है कि वह अपनी इच्छानुसार कदम उठाये

# वही, पृ. 708-09