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74 बाबा साहेब डा. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

और संसद जो कदम उठा सकती है उनमें एक यह कहना होगा कि हम इन उपाधियों को मान्यता नहीं देंगे।

श्री एच.वी. कामथ ः मैं चाहता हूँ डॉ. अम्बेडकर सिद्धांत को स्वीकार कर लें। बाद में संसद जो चाहे कर सकती है।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ः निश्चित रूप से यह सामान्य बोध का प्रश्न है कि यदि संविधान कहता है कि कोई व्यक्ति उपाधि स्वीकार नहीं करेगा तो संसद का कर्त्तव्य यह देखना होगा कि कोई नागरिक इस प्रावधान का उल्लंघन न करे।

ऽ ऽ ऽ ऽ

ख्ऽ, श्रीमान् उपाध्यक्ष (डा. एच.सी. मुखर्जी) - हम सदन की इच्छाओं को पूरा करने की कोशिश करेंगे।

हमने अनुच्छेद 12 पर अपनी चर्चा पूरी कर ली है और डॉ. अम्बेडकर ने अपना जवाद दे दिया है। मुझे खेद है कि मैं उन सदस्यों की सहायता नहीं कर सकता जो इस पर पुनः चर्चा शुरू करना चाहते हैं। अब मैं विभिन्न संशोधनों को, एक के बाद एक, मतदान के लिए रखूंगा।

फ्कि अनुच्छेद 12 की धारा (1) में शब्द ‘उपाधि’ के बाद शब्दों ‘जो सैनिक या शैक्षिक विशिष्टता नहीं है’ अन्तर्विष्ट किए जाएं।य्

श्रीमान् कृष्णमाचारी का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया गया।

अनुच्छेद 12, यथासंशाधित रूप में, संविधान में जोड़ दिया गया।

ऽ ऽ ऽ ऽ

अनुच्छेद 13

[♣] महबूब अली बेग साहिब बहादुर ः मैं इस प्रश्न को प्रारुप समिति के अध्यक्ष के समक्ष रखता हूँ कि क्या इन परिस्थितियों में, अर्थात ् जहाँ स्वयं संविधान में विधायिका या कार्यपालिका को धारा (1) में उल्लिखित अधिकारों को कम करने के लिए आदेश या कानून पारित करने के लिए एक प्रावधान अस्तित्व में है, अदालत उस आदेश या कानून के गुणों या अवगणों पर विचार कर सकती है और किसी कानून को अवैध या किसी अधिनियम को अनुचित घोषित कर सकती है? मेरे विचार में संविधान में यह स्पष्ट उल्लेख करके अदालत की न्याय शक्ति को वंचित कर दिया गया है कि सार्वजनिक व्यवस्था के हित में, ...... राज्य के पास अभियोग पत्र, समिति या सभा से संबंधित कानून बनाने की शक्ति होगी।

ऽ ♣ सी.ए.डी., अंक सी.ए.डी., अंक VIIVII, 30 नवम्बर, 1948, पृ. 711, 1 दिसम्बर, 1948, पृ. 735