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माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर (बम्बई - जनरल) ः महोदय, यदि मैं अपने माननीय मित्र को बीच में टोक सकता हूँ, मैं उनकी बात समझ चुका हूँ और मैं इसके लिए प्रशंसा करता हूँ और मैं उत्तर देने की और उन्हें इसके तात्पर्य के बारे में संतुष्ट करने की जिम्मेदारी लेता हूँ। इसलिए उनके लिए इसे और खींचना अनावश्यक होगा।
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ख्ऽ, पंडित ठाकुरदास भार्गव ः ........ इसी तरह, अब आपके पास शांतिपूर्ण तरीके से बिना हथियारों के जमा होने का अधिकार है और 1947 में आपने कानून पारित किया था जिसके तहत शांतिपूर्ण ढंग से जमा होने पर भी बिना किसी चेतावनी के आकाश से बम गिराये जा सकते थे। हमारे पास आज बहुत से प्रावधान हैं जो लोगों के शांतिपूर्ण ढंग से जमा होने के विरुद्ध हैं। समितियों और संघों पर प्रतिबंध के संबंध में भी यही स्थिति है।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ः क्या मेरे माननीय मित्र के लिए सामान्य खण्डों पर भी बोलने की छूट है?
श्रीमान् उपाध्यक्ष ः मैं इसी ओर उनका ध्यान आकृष्ट करने का प्रयत्न कर रहा हूँ।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ः यह सदन की प्रक्रिया का दुरुपयोग है। मैं यह कहने के लिए विवश हूँ। जब कोई सदस्य किसी संशोधन पर बोलता है तो उसे उस संशोधन तक ही सीमित रहना चाहिए। उसे इस अवसर की सुलभता नहीं हो जाती कि वे पूरे प्रकरण पर चर्चा करने लग जाए।
पंडित ठाकुरदास भार्गव ः मैं संशोधन पर ही बोल रहा हूँ, लेकिन जिस ढंग से डॉ. अम्बेडकर बोलते हैं और अपनी बात कहते हैं, वह बहुत ही आपत्तिजनक है। डॉ. अम्बेडकर को उठकर धमकी भरे अंदाज में या धौंस जमाने वाले लहजे में नहीं बोलना चाहिए।
श्रीमान् उपाध्यक्ष ः ऐसा लगता है कि सभापीठ को छोड़कर प्रत्येक व्यक्ति अपना आपा खो चुका है। (हँसी)। मैने श्रीमान् भार्गव को एक चेतावनी दी थी और, मैं अभी फिर देने वाला था जब डॉ. अम्बेडकर खड़े हो गये। मुझे पूरा यकीन है कि वह अपनी भावना में बह गये। मुझे इतनी अधिक उत्तेजना का कोई कारण नहीं दिखता। वह कई दिनों से तनाव में रहे हैं। मैं उनकी स्थिति अच्छी तरह समझ सकता हूँ और आशा करता हूँ कि सदन मामले को यहीं समाप्त होने देगा।
अब, मैं आशा करता हूँ कि श्रीमान् भार्गव को स्थिति का अहसास हो गया होगा।
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♣ माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ः महोदय, मैं प्रस्ताव करता हूँ -
फ्कि संशोधन नं. 454 के संदर्भ में .....................य्
ऽऽ ♣ वही, पृ. 738 सी.ए.डी., अंक सी.ए.डी. (आधिकारिक प्रतिवेदन), अंक VII, 1 दिसम्बर, 1948, पृ. 740-42 VII, 19 नवम्बर, 1948, पृष्ठ 477-78