अनुच्छेद 13 - Page 91

76 बाबा साहेब डा. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

श्री एच.वी. कामथ ः नियमापत्ति पर, महोदय, क्या संशोधन सं. 454 प्रस्तावित किया जा चुका है।

श्रीमान् उपाध्यक्ष ः कृपया जारी रखें।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ः ‘संशोधनों की सूची में संशोधन सं. 454 के संदर्भ में-

( i ) अनुच्छेद 13 की धारा (3), (4) (5) और (6) में, शब्दों ‘किसी प्रचलित

कानून’ के बाद शब्द ‘जहाँ तक यह निर्धारित करता है’ अन्तर्विष्ट किए जाएं,

और

( ii ) अनुच्छेद 13 की धारा (6) में, शब्द ‘विशेषकर’ के बाद शब्दों ‘उक्त धारा

की कोई बात किसी प्रचलित कानून के कार्यान्वयन को जहाँ तक यह कानून

किसी प्राधिकारी को राज्य को कानून बनाने से रोकने या निर्धारित करने के

लिए निर्धारित करता है या शक्ति देता है, प्रभावित नहीं करेगी’ को अन्तर्विष्ट

किया जाए।य्

सईद अब्दुर राउफ (असम - मुसलमान) ः नियमापत्ति पर, महोदय, मेरे विचार से डॉ. अम्बेडकर का संशोधन सं, 454 में संशोधन नहीं हो सकता। संशोधन सं. 454 धारा (2), (3), (4) (5) और (6) को समाप्त करने की माँग करता है जबकि डॉ. अम्बेडकर का संशोधन इन धाराओं के कुछ शब्द अन्तर्विष्ट करने का प्रयत्न करता है और इसलिए इसे संशोधन में संशोधन की तरह प्रस्तावित नही किया जा सकता है।

श्रीमान् उपाध्यक्ष ः मुझे ऐसा लगता है कि डॉ. अम्बेडकर वास्तव में जो करने का प्रयत्न कर रहे हैं वह मूल धाराओं को कुछ निश्चित योग्यताओं के साथ बनाये रखना है। इसलिए मैं फैसला देता हूँ कि वे नियम के अनुकूल हैं।

श्री एच.वी. कामथ ः यह मूल संशोधन को नकार देने जैसा होगा।

श्रीमान् उपाध्यक्ष ः कृपया अपना स्थान ग्रहण करें।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ः उन भाषणों जो अनुच्छेद 13 और अनुच्छेद 8 पर दिये गये हैं और शब्दों ‘प्रचलित कानून’ जो अनुच्छेद 13 के कुछ प्रतिबंधों में आते हैं, से मुझे यह लगता है कि इस विषय में बहुत ज्यादा गलतफहमी है कि प्रचलित कानून के संबंध में वास्तव में क्या किए जाने का इरादा है? अब मूल अनुच्छेद, अनुच्छेद 8 है जो, विशेष रूप से, बिना किन्हीं शर्तों के कहता है कि कोई प्रचलित कानून जो संविधान के इस भाग में अधिनियमित मूलाधिकारों के असंगत है, अमान्य है। यह एक मूल सिद्धांत है और मुझे इसके बारे में कोई संदेह नहीं है कि यदि किसी प्रशिक्षित अधिवक्ता से अनुच्छेद 13 की धाराओं मे आने वाले शब्दों ‘प्रचलित कानून’ की व्याख्या करने के लिए कहा जाए तो वह जहाँ तक ये मूलाधिकारों के असंगत नहीं है इन्हें प्रचलित कानून ही बतायेगा। इसमें कोई संदेह नहीं है कि धाराओं में शब्दों ‘प्रचलित कानून’ की इसी ढंग से व्याख्या की जाएगी। अनुच्छेद 8 में कहे गये सिद्धांत को वाक्यांश ‘प्रचलित कानून’ के साथ हर बार दोहराने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि व्याख्या का एक नियम है कि किसी कानून की व्याख्या करते