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समय सभी संबंधित भागों का ध्यान रखा जाए और इस तरह पढ़ा जाए कि एक भाग का दूसरे भाग से मेल बैठ जाए। इसलिए, प्रारुप समिति ने महसूस किया और अनुच्छेद 8 में एक पूर्ण सिद्धांत निर्धारित किया कि किसी भी प्रचलित कानून, जहाँ तक यह मूलाधिकारों के लिए अप्रासंगिक है, को रदद समझा जाएगा। प्रारुप समिति ने उन विभिन्न धाराओं में ् वाक्यांश ‘प्रचलित कानून’ के प्रयोग में किसी योग्यता को शामिल करने की आवश्यकता महसूस नहीं की जिनमें यह वाक्यांश आता है। जैसा मैं देखता हूँ बहुत से लोग इस धारा को इस ढंग से पढ़ने में सफल नहीं हुए हैं। फ्प्रचलित कानूनय् को पढ़ते समय वे यह भूल गये लगते हैं जो अनुच्छेद 8 में पहले ही कहा जा चुका है। आम व्यक्ति के दिमाग में जो गलतफहमी हो सकती है उसे दूर करने के लिए ही मैं उपधाराओं (3), (4), (5) और (6) में यह संशोधन लाया हूँ। उदाहरण के लिए, ही मैं उपधारा (3) अपने संशोधन के साथ पढ़ूंगा। फ्उक्त धारा उपधारा (ब) की कोई बात जहाँ तक यह लागू होती है किसी प्रचलित कानून के कार्यान्वयन को प्रभावित करेगी अथवा राज्य को कोई ऐसा कानून जो सार्वजनिक व्यवस्था के हितों में लागू किया गया है बनाने से नहीं रोकेगीय्
मैं श्रीमान् भार्गव का संशोधन स्वीकार कर रहा हूँ और इसलिए मैं शब्द ‘उचित’ भी जोडूंगा।
फ्उक्त उपधारा द्वारा प्रदत्त अधिकार के प्रयोग पर सार्वजनिक व्यवस्था के हितों में उचित पाबन्दियां लगाते हुए।य्
अब शब्द ‘जहां तक यह लागू होता है’ मेरे विचार में बात को स्पष्ट कर देते हैं और किसी ऐसे संदेह से मुक्त कर देते हैं कि प्रचलित कानून केवल तभी तक सुरक्षित रह सकता है जहाँ तक यह उचित पाबंदियां लगाता है। मेरे विचार से इस संशोधन के साथ यह समझने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए कि प्रचलित कानून केवल एक सीमित मात्रा तक सुरक्षित है और यह केवल तभी तक सुरक्षित है जब तक यह मूलाधिकारों के विरोध में नहीं है।
उपधारा 6 के शब्द इसलिए भिन्न हैं, क्योंकि वे उपधाराओं (3), (4) और (5) में आने वाले शब्दों से भिन्न हैं। माननीय सदस्य स्वयं ही पढ़ें ताकि वे समझ सकें कि इसका सही अर्थ क्या है? अब, मेरे मित्र, पंडित ठाकुरदास भार्गव प्रारुप समिति के विरुद्ध उस पर प्रचलित कानूनों को सुरक्षित रखने में रास्ते से भटक जाने का आरोप लगाते हुए लम्बे भाषण देने पर उतर आये हैं। मुझे नहीं मालूम कि प्रारुप समिति से वे क्या कार्य कराना चाहते हैं? क्या वे हमसे साफ-साफ कहलवाना चाहते हैं कि सभी प्रचलित कानून उसी दिन रद ् द हो जाएंगे जिस दिन यह संविधान अस्तित्व में आता है?
पंडित ठाकुरदास भार्गव ः पूरी तरह से ऐसा नहीं है।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ः हमने जो कहा है वह यह है कि ऐसे प्रचलित कानून जो इस संविधान के प्रावधानों के लिए अप्रासंगिक है, रद ् द समझे जायेंगे। यकीनन इस देश का प्रशासन उन कानूनों के जारी रहने पर निर्भर करता है जो आज अमल में है। यदि प्रचलित कानूनों को पूर्णतया समाप्त कर दिया जाता है तो पूरा का पूरा प्रशांसन तहस-नहस हो जाएगा।