अनुच्छेद 13 - Page 93

78 बाबा साहेब डा. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

अब, मैं अनुच्छेद 307 लेता हूँ । उन्होंने कहा कि हमने प्रावधान किया है कि प्रचलित कानूनों को तब तक जारी रहना चाहिए जब तक उन्हें संशोधित नहीं किया जाता। अब, मेरे विचार में एक व्यक्ति जो कानून समझता है उसे इस सच्चाई का अहसास करने में सक्षम होना चाहिए कि जब संविधान अस्तित्व में आ जाएगा उसके बाद इस देश में संसद तथा कई स्थानीय विधायिकाओं को अपने संबंधित क्षेत्रों में कानून बनाने का विशेष अधिकार होगा। स्पष्ट है कि यदि आप इस सिद्धांत को प्रतिपादित करते हैं कि इसके बाद कोई भी कानून अमल में नहीं रहेगा या इसके पास शक्ति या अनुशास्ति नहीं होगी जब तक यह संसद द्वारा पारित नहीं किया गया है, तो क्या स्थिति होगी? स्थिति यह होगी कि वे सब कानून जो पूर्व विधायिका, केन्द्रीय विधानसभा या प्रांतीय विधानसभा द्वारा बनाये गये हैं टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगे, क्योंकि उनके पास अनुशास्ति समाप्त हो जाएगी, चूंकि वे संसद द्वारा या स्थानीय विधायिकाओं द्वारा नहीं बनाये गए हैं और संविधान के तहत केवल ये निकाय ही कानून बनाने के लिए अधिकृत हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि संविधान में एक प्रावधान हो कि ऐसे कानूनों को जो पहले बनाये गये हैं केवल इसलिए रद ् द नहीं माना जायेगा कि उन्हें संसद ने नहीं बनाया है। इसी वजह से अनुच्छेद 307 को इस संविधान में शामिल किया गया है। इसलिए, मैं कहता हूँ, महोदय, मेरा संशोधन, जो प्रचलित कानून के उस अंश को विशिष्टता प्रदान करता है जिसका जहाँ तक मूलाधिकारों से संबंध है अमल में रहेगा, उस कठिनाई का मुकाबला करता है जो कई सदस्यों ने इस सच्चाई के मद ् देनजर महसूस की है कि वे अनुच्छेद 13 को अनुच्छेद 8 के साथ जोड़कर पढ़ने में कठिनाई पाते हैं। इसलिए मेरे विचार से मेरा यह संशोधन स्थिति को स्पष्ट कर देता है और मैं आशा करता हूँ कि सदन को इसे स्वीकार करने में कोई कठिनाई नहीं होगी।

¹इस स्पष्टीकरण के बाद कई संशोधन प्रस्तावित नहीं किए गये।ह्

ऽ ऽ ऽ ऽ

ख्ऽ, माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ः महोदय, मैं प्रस्ताव करता हूँ -

फ्कि अनुच्छेद 13 की धारा 4 में, शब्दों ‘आम जनता’ के लिए शब्दों ‘सार्वजनिक व्यवस्था या नैतिकता’ को प्रतिस्थापित किया जाए।य् इस धारा में ये शब्द अनुपयुक्त हैं।

श्रीमान् उपाध्यक्ष ः 477 समान रूप का है। 479, 480 और 486 समान अर्थ वाले हैं।

¹संशोधन संख्या 479, 480 और 486 प्रस्तावित नहीं किए गए ।ह्

ऽ ऽ ऽ ऽ

ऽ सी.ए.डी., अंक VII, 1 दिसम्बर, 1948, पृ. 744