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[#] माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ः श्रीमान् उपाध्यक्ष, महोदय, मैं प्रस्ताव करता हूँ-
फ्कि अनुच्छेद 123 की धारा (5) में, शब्द ‘आदिवासी’ के लिए शब्द ‘अनुसूचित’ को प्रतिस्थापित किया जाए।य्
जब प्रारुप समिति मूलाधिकारों पर विचार कर रही थी तब आदिवासी क्षेत्रों के लिए नियुक्त की गई समिति ने अपना प्रतिवेदन तैयार नहीं किया था परिणामस्वरूप जिस समय प्रारुप तैयार किया गया उस समय हमें ‘आदिवासी’ शब्द का प्रयोग करना पड़ा। बाद में हमने पाया कि आदिवासी क्षेत्रों के लिए नियुक्त समिति ने वाक्यांश ‘अनुसूचित’ जनजाति’ का प्रयोग किया था और हमने उन अनुसूचियों में शब्द ‘अनुसूचित जाति’ का प्रयोग किया जो इस संविधान के संलग्न हैं। भाषा को एक जैसा रखने के लिए यह आवश्यक है कि शब्द ‘अनुसूचित’ को शब्द ‘आदिवासी’ के लिए प्रतिस्थापित किया जाए।
श्रीमान् उपाध्यक्ष ः हमारे पास, मैं समझता हूँ, इस संशोधन के लिए एक संशोधन है जो सूची में संशोधन सेख्या 56 है जो श्री फूल सिंह के नाम में है।
¹सूची I का संशोधन संख्या 56 प्रस्तावित नहीं किया गया है।ह्
श्रीमान् उपाध्यक्ष ः इसका अर्थ हुआ कि संशोधन सं. 491 जैसा का तैसा बना रहेगा।
तब हम संशोधन सं. 488 पर आते हैं।
¹संशोधन नं. 488 प्रस्तावित नहीं किया गया।ह्
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ः महोदय, मैं प्रस्ताव करता हूँ -
फ्कि अनुच्छेद 13 की धारा (6) में, शब्दों ‘सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता या स्वास्थ्य’ के लिए शब्दों ‘आम जनता’ को प्रतिस्थापित किया जाए।य्
शब्द ‘सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता या स्वास्थ्य’ इस विशेष धारा में काफी अनुपयुक्त है।
ऽ ऽ ऽ ऽ
* श्री एम. अनन्थासयमन आयंगर ः ........ अब, इसलिए उन संशोधनों के अलावा जो डॉ. अम्बेडकर को स्वीकार्य हैं अन्य को स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। वे आपत्तिजनक हैं और उन्हें संविधान में स्थान नहीं मिलना चाहिए।
श्री सत्यनारायण सिन्हा (बिहार - जनरल) ः मैं प्रस्ताव करता हूँ कि प्रश्न अब रखा जाए।
श्रीमान् उपाध्यक्ष ः मुझसे पूछा गया कि मैंने सदन की कार्यवाही किस प्रकार संचालित की। मैंने दस समय जानकारी देने से मना कर दिया था, क्योंकि मैंने सोचा था कि यह बताना मेरे विवेक पर छोड़ा जा सकता है कि मैं सदन की कार्यवाही किस
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* सी.ए.डी. अंक VII, 2 दिसम्बर, 1948 पृ. 779-83