80 बाबा साहेब डा. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
प्रकार संचालित करता हूँ। मैं पाता हूँ कि मैं उन सब सदस्यों की इच्छाओं को संतुष्ट नहीं कर सका हूँ जिन्होंने बोलने की इच्छा प्रकट की थी। इस समय मेरे पास विभिन्न सज्जनों के 25 नोट हैं। ये सभी सज्जन बोलने के लिए उत्सुक हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि इनमें से प्रत्येक चर्चा में कुछ न कुछ योगदान करने मे सक्षम होंगे। लेकिन चर्चा अनिश्चितकाल के लिए नहीं चल सकती। इस सूची में वे लोग शामिल नहीं हैं जो अपनी बात रखने के लिए हैं और इन लोगों ने खड़े होकर अपनी राय व्यक्त करने की कोशिश भी की थी, पर उन्हें अवसर नहीं मिल पाया। मैने पूरे सदन के विचार जानने की कोशिश की है। यदि कृपा करके माननीय सदस्य उन वक्ताओं की सूची पर गौर करेंगे जो पहले ही सदन को संबोधित कर चुके हैं तो वे पायेंगे कि प्रत्येक प्रांत को प्रतिनिधित्व मिला है और प्रत्येक प्रांत से प्रत्येक कथित अल्पसंख्यक को प्रतिनिधित्व मिला है। मेरे विचार में जो पंडित एल.के. मैत्रा कहते हैं कि बंगालियों का बहुमत है, उसके बावजूद मेरे विचार में, विषय पर पूरी तरह चर्चा हो चुकी है। लेकिन, हमेशा की तरह, मैं जानना चाहूँगा कि क्या यह सदन की इच्छा है कि हमें चर्चा बन्द कर देनी चाहिए?
माननीय सदस्य ः हाँ, हाँ।
श्रीमान् उपाध्यक्ष ः तब मैं डॉ. अम्बेडकर से जवाब देने का अनुरोध करूँगा।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर (बम्बई - जनरल) ः श्रीमान् उपाध्यक्ष, महोदय, इस अनुच्छेद 13 के लिए प्रस्तावित किए गए बहुत से संशोधनों में से, मैं संशोधन सं. 415, नं. 453 जैसा श्रीमान् मुंशी के संशोधन सं. 86 द्वारा संशोधित किया गया, और सूची I का संशोधन नं. 49, जैसा ‘उचित’ शब्द जोड़ने के लिए श्रीमान् ठाकुरदास भार्गव के संशोधन द्वारा संशाधित किया गया, को स्वीकार करने का प्रस्ताव करता हूँ।
श्रीमान् उपाध्यक्ष ः क्या कृपया आप हमें यह बतायेंगे कि संशोधन सं. 415 को किस रूप में स्वीकार करने का आपने प्रस्ताव किया है?
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ः उस संशोधन के रूप में जो शब्दों ‘इस अनुच्छेद के अन्य प्रावधानों के अधीन’ को हटाने का प्रयत्न करता है।
श्रीमान् उपाध्यक्ष ः और इसके बाद?
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ः इसके बाद मैं 453 जैसा संशोधन सं. 86 द्वारा संशोधित किया गया, और सूची I के संशोधन सं. 49, जैसा पंडित ठाकुरदास भार्गव के संशोधन द्वारा शब्द ‘उचित’ जोड़ने के लिए संशोधित किया गया, को स्वीकार करता हूँ।
अब, महोदय, अन्य संशोधनों तथा वक्ताओं द्वारा अपने भाषणों में उठायी गयी बातों पर आते हुए, मैं पाता हूँ कुछ ही बातें हैं जिनका उत्तर देना आवश्यक है।
अनुच्छेद 13 की सामान्य आलोचना के संबंध में, जो धारा (1) की उपधाराओं पर केन्द्रित रहा है, मेरे विचार से, मैं कह सकता हूँ कि सदन अब यह महसूस करने की स्थिति में होगा कि यह अनुच्छेद अपने में संशोधनों के साथ इस रूप में उभरा है जो आमतौर पर संतोषप्रद है। अनुच्छेद 8 के महत्व के बारे में मेरा स्पष्टीकरण, वाक्यांश