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श्री एच. वी. कामथ ः (बीच में बोलने के लिए उठे।)
श्रीमान् उपाध्यक्ष ः श्रीमान् कामथ, आप टोकें नहीं। आप यह नहीं कह सकते कि मैंने आपको पर्याप्त स्वतंत्रता नहीं दी।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ः वैयक्तिक कानून को बचाने के प्रश्न पर आते हुए, मेरे विचार से इस विषय पर पूरी और पर्याप्त चर्चा और बहस उस समय हो चुकी है जब हमने इस संविधान के उस एक निदेशात्मक सिद्धांत पर चर्चा की थी जो राज्य को समान नागरिक संहिता के लिए प्रयत्न करने का आदेश देता है और मेरे विचार से इसको बारे में आगे कुछ भी कहने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन मैं इतना कहना चाहूँगा कि, यदि इस प्रकार की कोई बचाव संबंधी धारा संविधान में अंतर्विष्ट की जाती तो यह भारत में विधायिकाओं को कोई किसी भी प्रकार का सामाजिक मापदण्ड अधिनियमित करने में अक्षम बना देती। इस देश में धार्मिक अवधारणायें इतनी व्यापक हैं कि वे, जन्म से लेकर मृत्यु तक, जिन्दगी के प्रत्येक पहलू को शामिल कर लेती हैं। यहाँ ऐसा कुछ भी नहीं है जो धर्म न हो और वैयक्तिक कानून को बचाना है तो मुझे इसका यकीन है कि सामाजिक मामलों में हम ठहराव पर आ जायेंगे। मैं नहीं सोचता कि इस तरह के दृष्टिकोण को स्वीकार करना संभव है। यह कहने में कुछ भी असाधारण नहीं है कि हमें भविष्य में धर्म की परिभाषा को इस तरह से सीमित करने को प्रयत्न करना चाहिए कि हम आस्था तथा ऐसे धार्मिक कृत्यों से आगे न बढ़ें जो तत्वतः धार्मिक हैं। यह आवश्यक नहीं है कि इस प्रकार के कानून जैसे-काश्तकारी से संबंधित कानून या उत्तराधिकार से संबंधित कानून, धर्म द्वारा नियंत्रित किए जाएं। यूरोप में ईसाई धर्म है लेकिन ईसाई धर्म का यह अर्थ नहीं है कि विश्व के सभी ईसाइयों का या यूरोप के किसी भाग में जिसमें वे रहते हैं उन ईसाइयों की उत्तराधिकार के कानून की व्यवस्था एक हो। इस तरह की कोई बात नहीं है। व्यक्तिगत रूप से मुझे समझ नहीं आता कि धर्म को इतना बड़ा विस्तृत न्यायाधिकार किसलिए दिया जाना चाहिए जिससे कि यह जीवन के प्रत्येक पहलू पर निगरानी रखे और विधायिका को इस क्षेत्र का अतिक्रमण करने से रोके। आखिरकार, हम किसलिए यह आजादी ले रहे हैं? हम यह आजादी अपनी उस सामाजिक व्यवस्था को सुधारने के लिए ले रहे हैं जिसमें इतनी अधिक असमानतायें और भेदभाव और इसी तरह की अन्य बातें भरी पड़ी हैं जो हमारे मूलाधिकारों के विरुद्ध हैं। इसलिए किसी के लिए यह सोचना बिल्कुल आसान है कि वैयक्तिक कानून को राज्य के न्यायालय से बाहर रखा जाएगा। ऐसा कहने के बाद, मैं यह भी बताना चाहूँगा कि राज्य उसके मामले में जो कुछ मांग रहा है यह विधि-निर्माण की शक्ति है। राज्य का वैयक्तिक कानूनों को नष्ट करने का कोई दायित्व नहीं है। वह केवल शक्ति दे रहा है। इसलिए, किसी को इस सच्चाई के प्रति संशंकित होने की आवश्यकता नहीं है कि, यदि राज्य के पास शक्ति होगी तो वह उस शक्ति को इस ढंग से अमल में लाने या लागू करने के लिए तुरंत अग्रसर होगा जिसे मुसलमान, ईसाई या भारत का कोई समुदाय आपत्तिजनक हो सकता है।