अनुच्छेद 144 - Page 100

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* माननीय सभापतिः ........डॉ. अम्बेडकर।

** माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः सभापति महोदय, यहाँ प्रस्तत किए गए विभिन्न संशोधनों पर हुई इस बहस के दौरान मैंने इस बात पर गौर किया है कि इसमें केवल चार ही मुद्दे ऐसे हैं जिन पर जवाब दिए जाने की जरूरत है। बहस में पहला मुद्दा यह उठाया गया है कि इस उपबंध के तहत मंत्री गवर्नर की इच्छा पर्यन्त पद पर बने रहेंगे, के स्थान पर यह उपबंध किया जाना वांछित है कि वे अपने पद पर तब तक बने रहेंगे जब तक कि सभा में उन्हें बहुमत प्राप्त रहेगा। अब मुझे इस बारे में कोई संशय नहीं है कि इस संविधान की मंशा यही है कि मंत्रालय उस समय तक अपना कार्य करता रहेगा जब तक कि उसे बहुमत का विश्वास प्राप्त रहेगा। इसी सिद्धांत के आधार पर संविधान कार्य करेगा। हमने इसे बिल्कुल स्पष्ट रूप से व्यक्त नहीं किया है। इसका एक कारण है कि इसकी अभिव्यक्ति की शैली वही है या फिर संसदीय लोकतंत्र की प्रणाली वाली सरकार को विनिर्दिष्ट करने वाले किसी भी संविधान में उन्हीं शब्दों का प्रयोग किया गया है। फ्प्रसाद पर्यन्तय् से हमेशा यह आशय होता है कि बहुमत का विश्वास खो दिए जाने के बाद उस इच्छा का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। सरकार जब बहुमत का विश्वास

खो देती है तो उसी क्षण यह माना जाता है कि राष्ट्रपति उस सरकार को बर्खास्त करने में अपनी इच्छा का प्रयोग करेगी और इसीलिए इसमें जो पहले से बने बनाए शब्द रखे गए हैं उससे अलग मत रखना अनावश्यक है। क्योंकि सभी जिम्मेदार सरकारों में इन्हीं शब्दों का प्रयोग होता है। मेरे मित्र प्रो. सक्सेना का जो संशोधन है उसमें फ्निचले सदनय् शब्दों को प्रतिस्थापित करने की बात कही गई है। मुझे खेद है कि इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता क्योंकि संविधान के उपबंधों के अधीन प्रधानमंत्री के लिए यह विकल्प

खुला हुआ है कि वह न सिर्फ निम्न सदन से बल्कि उच्च सदन से भी अपने मंत्रियों का चयन कर सकता है। इसमें ऐसी कोई योजना नहीं है कि मंत्री केवल निम्न सदन से लिए जाएंगे, उच्च सदन से नहीं। परिणामतः यह जो उपबंध है कि मंत्री की नियुक्ति 6 महीने के लिए की जाएगी। यद्यपि उस समय वह निर्वाचित नहीं है लेकिन, इसे व्यापकता प्रदान करनी होगी ताकि दोनों ही स्थितियों को इसमें शामिल किया जा सके और उसी कारण से मैं उनके संशोधन को स्वीकार करने में असमर्थ हूँ।

तीसरे संशोधन जिस पर काफी बहस की गई है, मेरे मित्र श्री कामत और प्रो. शाह द्वारा प्रस्तुत किया गया है। छोटे-मोटे संशोधनों को छोड़ दिया जाए तो कमोबेश वे एक जैसे हैं। उस संबंध में मैं यह कहना चाहता हूँ कि सभा को यह याद होगा कि संशोधन संख्या 1332 जो कि अनुच्छेद 62 के मामले में प्रस्तुत किया गया है जो कि अनुच्छेद

* ख्., सीएडी, खण्ड VIII, दिनांक 1 जून, 1949, पृ. 520-21

** वही, पृष्ठ 520-21