अनुच्छेद 144 - Page 101

82 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

144 के समदर्शी उपबंध है, और उसे प्रो. शाह द्वारा प्रस्तुत किया गया है उस पर व्यापक बहस हुई थी। उस अवसर पर मैंने उस विषय के बारे में जो मेरे विचार थे उसे प्रस्तुत किया था और इसलिए मुझे लगता है कि मैं उस समय जो कुछ कह चुका हूँ उसमें आगे और भी कुछ जोड़ना बिल्कुल अनावश्यक है।

श्री एच.वी. कामतः मेरे माननीय मित्र डॉ. अम्बेडकर ने उस अवसर पर उस संशोधन को स्वीकार नहीं किया था क्योंकि उनके विचार से वह व्यापक संशोधन नहीं था। अब यह कहीं अधिक व्यापक संशोधन है।

माननीय सभापतिः आप यह सब बता चुके हैं।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मेरे मित्र श्री जयपाल सिंह द्वारा उठाया गया चौथा बिंदु वह है और कुछ हद तक श्री रोहिणी कुमार चौधरी द्वारा उठाया गया है। प्रारूप संविधान में इस विशेष खण्ड को रखे जाने का कारण यह रहा है कि संविधान सभा की अल्पसंख्यक समिति द्वारा नियुक्त जनजाति संबंधी उपसमिति द्वारा इसकी सिफारिशें की गई थीं। इसमें यह देखा जा सकता है कि इसमें एक परिशिष्ट लगा हुआ है जिसे फ्सांविधिक सिफारिशय् का नाम दिया गया है। इस अनुच्छेद में जो परंतुक रखा गया है उसमें इस विशेष समिति द्वारा दिए गए सुझाव और सिफारिश को हू-ब-हू उतार दिया गया है। उसमें यह कहा गया है कि बिहार, मध्य प्रान्तों और बरार तथा उड़ीसा प्रान्तों के मामले में जनजाति कल्याण के लिए एक पृथक मंत्रालय रहेगा। बशर्तें मंत्री अनुसूचित जातियों और पिछड़े वर्गों के कल्याण से संबंधित प्रभार या किसी अन्य कार्य का प्रभारी भी साथ में बना रहेगा। इसलिए, प्रारूप समिति के पास इस परंतुक को शामिल करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं था क्योंकि जनजाति समिति के प्रतिवेदन के उस भाग में यह अन्तर्विष्ट किया गया था जिसका शीर्षक है फ्सांविधिक सिफिरशय्। इस समिति की मंशा यह थी कि इस उपबंध को संविधान में ही रखा जाना चाहिए, इसे किसी अन्य भाग में स्थानांतरित नहीं किया जाना चाहिए। इसलिए प्रारूप समिति ने ऐसा किया है और उसने दूसरी समिति की सिफारिश का अनुपालन मात्र किया है।

मेरे मित्र श्री जयपाल सिंह ने जो यह सुझाव दिया है कि इसमें इस तथ्य के मद्देनजर बम्बई को शामिल किया जाना चाहिए क्योंकि बम्बई प्रेसीडेंसी में जो विलय किए गए हैं, उनके परिणामस्वरूप जनजाति लोगों की संख्या में वृद्धि हुई है, के संबंध में मुझे खेद के साथ यह कहना पड़ रहा है कि इस चरण में मैं इसे स्वीकार नहीं कर सकता। क्योंकि यह एक ऐसा मामला है जिस पर बम्बई मंत्रालय से परामर्श किया जाना आवश्यक है और दुर्भाग्यवश मेरे मित्र माननीय श्री खेर जो विगत के कुछ दिनों के दौरान संविधान सभा में उपस्थित दिखाई पड़ते थे, इस समय यहाँ उपस्थित नहीं है और इसीलिए मैं इस संशोधन को स्वीकार करने में समर्थ नहीं हूँ।