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पहली बात यह है कि सभा को इस तथ्य को ध्यान में रखना चाहिए कि संविधान के अंतर्गत राज्यपाल का कोई ऐसा कृत्य नहीं है जिसका वह स्वयं निर्वहन कर सकता है। जब उसके पास कोई कृत्य नहीं है, तो उसे कतिपय कर्त्तव्य का निर्वहन करना होता है और मेरे विचार से सभा यदि इस विशिष्ट स्थिति को ध्यान में रखे तो बेहतर होगा। इस तथ्य को निश्चित रूप से ध्यान में रखा जाना चाहिए कि यह अनुच्छेद राज्यपाल को किसी विशेष मामले में मंत्रालय के किसी निर्णय को बदलने की शक्ति प्रदान नहीं करता। इस अनुच्छेद के अधीन भी, राज्यपाल मंत्रालय की सलाह को स्वीकार करने के लिए बाध्य है। मेरे विचार से इस तथ्य को नहीं भुलाया जाना चाहिए। इस अनुच्छेद में कहीं भी खण्ड (क) या खण्ड (ख) या खण्ड (ग) में यह नहीं कहा गया है कि किसी विशेष परिस्थिति में राज्यपाल मंत्रालय के निर्णय को बदल सकता है। इसिलए, यह जो आलोचना की गई है कि इस अनुच्छेद से कहीं न कहीं राज्यपाल को कैबिनेट के निर्णय में हस्तक्षेप करने या उसे बाधित करने में समर्थ बनाता है, पूरी तरह से निराधार है और इसे पूरी तरह से गलत समझा गया है।
श्री एच.वी. कामतः क्या वह इसे विलम्बित करने या बाधा डालने में सक्षम नहीं होगा ...?
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मैं जब अपनी बात कर रहा हूँ तो मेरे मित्र उसमें व्यवधान न डालें। अन्त में वह कोई भी प्रश्न पूछ सकते हैं और यदि मैं उत्तर देने की स्थिति में होऊँगा तो उत्तर दूँगा।
राज्यपाल के कृत्यों और उसके द्वारा निर्वहन किए जाने वाले कर्त्तव्यों के बीच अन्तर किया गया है। मेरा यह कहना है कि यद्यपि राज्यपाल के पास कोई कृत्य नहीं है लेकिन संवैधानिक राज्यपाल होने के कारण, जो वह है कतिपय कर्त्तव्यों का निर्वहन करना होता है। मेरे अनुसार उसके कर्त्तव्यों को दो भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है। एक तो यह कि उसे सरकार को बनाए रखना होता है। चूंकि सरकार उसकी इच्छापर्यन्त कार्यभार संभालती है। इसलिए उसे यह देखना होता है कि वह सरकार के विरुद्ध कब और किस प्रकार से अपनी उस इच्छा का प्रयोग करे। राज्यपाल का दूसरा कर्त्तव्य है, मंत्रालय को परामर्श देना, या उसे चेतावनी देना या किसी विकल्प के बारे में सूचना देना और किसी निर्णय पर पुनः विचार करने के लिए कहना आदि। मैं नहीं समझता कि इस सभा में कोई भी इस तथ्य पर प्रश्न उठाएगा कि राज्यपाल को इस कर्त्तव्य के बारे में बताया जाना चाहिए। अन्यथा वह पूरी तरह से एक अनावश्यक कार्यकारी बनकर रह जाएगा। ऐसा कोई बिल्कुल नहीं सोचेगा। वह एक प्रतिनिधि है, वह किसी दल का प्रतिनिधि नहीं है_ वह पूरे राज्य के लोगों का प्रतिनिधि होता है। वह लोगों के नाम पर प्रशासन चलाता है। उसे यह देखना चाहिए कि प्रशासन का स्तर ऐसा हो जिसे एक अच्छा, कुशल और ईमानदार