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खण्ड 152

माननीय सभापतिः फिर हम अनुच्छेद 152 पर आते हैं। इस अनुच्छेद के बारे में डॉ. अम्बेडकर का संशोधन है।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः महोदय, मैं प्रस्ताव करता हूँ।

फ्कि अनुच्छेद 152 के लिए, निम्नलिखित प्रतिस्थापित किए जाएंः

राज्य के विधानमंडल की सदस्यता के लिए अर्हता - कोई व्यक्ति किसी राज्य के विधानमंडल के किसी स्थान को भरने के लिए चुने जाने के लिए अर्हित तभी होगा जब-

(क) वह भारत का नागरिक है।

(ख) वह विधानसभा के स्थान के लिए कम से कम पच्चीस वर्ष की आयु का

और विधानपरिषद् के स्थान के लिए कम से कम पैंतीस वर्ष की आयु का

हो_ और

(ग) उसके पास ऐसी अन्य अहर्ताएं हैं जो इस निमित्त राज्य के विधानमंडल

द्वारा बनाई गई किसी विधि द्वारा या उसके अधीन विहित की जाएँ।

* * * * *

* माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः महोदय, मैं श्रीमती पूर्णिमा बैनर्जी द्वारा प्रस्तुत संशोधन को स्वीकार करता हूँ। उन्होंने जो खण्ड (ग) के बारे में आशंका प्रकट की है कि इस खण्ड से संसद द्वारा उम्मीदवारों के लिए संपत्ति संबंधी अहर्ताएं तय किए जाने की संभावना बनेगी, के बारे में मैं निश्चित तौर पर यह कह सकता हूँ कि उप-खण्ड (ग) में ऐसी कोई मंशा अन्तर्निहित नहीं है। इस खण्ड का उपबंध करने के पीछे यही मंशा है कि दिवालियापन, दिमागी हालत ठीक नहीं होने, निर्वाचन-क्षेत्र विशेष में निवास होने और ऐसी ही अन्य प्रकार की निहर्ताओं का प्रावधान किया जाए। निश्चय ही ऐसी कोई मंशा नहीं है कि संपत्ति संबंधी अर्हता को उम्मीदवारों के लिए आवश्यक शर्त के रूप में शामिल किया जाना चाहिए।

फिर, साक्षरता के बारे में मैं प्रो. के.टी. शाह के संशोधन के संबंध में मेरा यह विचार है कि यह ऐसा मामला है जिसे विधानमंडलों पर छोड़ा जा सकता है। यदि विधानमंडल अर्हताएं निर्धारित करने के समय ऐसा महसूस करता है कि साक्षरता एक आवश्यक अर्हता है, तो मेरे विचार से इसमें कोई शंका नहीं होनी चाहिए कि विधानमंडल ऐसा करेंगे।

* ख्., वही, पृष्ठ 553-554

सीएडी, खण्ड VIII, दिनांक 2 जून, 1948, पृ. 550