अनुच्छेद 167 - Page 113

94 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः उस पर राष्ट्रीयता अधिनियम में विचार किया जाएगा।

(संशोधन संख्या 2420 से 2423 प्रस्तुत नहीं किए गए।)

श्री एच.वी. कामतः मैं समझता हूँ कि मेरा संशोधन संख्या 2424 पूरी तरह से एक शाब्दिक संशोधन है और मैं इसे प्रारूप पर छोड़ता हूँ।

माननीय सभापतिः मैं समझता हूँ कि विषय-वस्तु की दृष्टि से भी यह महत्त्वपूर्ण है।

श्री एच.वी. कामतः यदि ऐसा है, तो मैं इसे प्रस्तुत करता हूँ। मैं प्रस्ताव करता हूँः

फ्अनुच्छेद 167 के खण्ड (1) के उप-खण्ड (घ) में सेमीकॉलन के बाद फ्अथवाय् शब्द जोड़ा जाए।य्

‘और’ शब्द हटा दिया जाए या इसके स्थान पर ‘अथवा’ शब्द प्रतिस्थापित कर दिया जाए, कमोबेश वही अर्थ होगा, जैसा कि मेरा अप्रशिक्षित मस्तिष्क सोचता है। इसलिए मैंने यह कहा था कि मैं इसे प्रारूप समिति के बुद्धिमान व्यक्तियों पर छोड़ता हूँ क्योंकि इन मामलों में एकदम नया हूँ। मेरा यह मानना है कि ‘अथवा’ शब्द अधिक उपयुक्त होगा क्योंकि इन निरर्हताओं में किसी एक भी निरर्हता का प्रश्न उठता है - यदि कोई व्यक्ति इसमें किसी एक कारण से अयोग्य ठहरा दिया जाता है तो यह अनुच्छेद लागू होगा।

माननीय सभापतिः डॉ. अम्बेडकर इस पर विचार करेंगे।

श्री एच.वी. कामतः जैसा कि मैं कह चुका हूँ, मैं इसका निर्णय प्रारूप समिति के बुद्धिमान व्यक्तियों पर छोड़ता हूँ।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः महोदय, मेरे विचार से यह बिल्कुल ठीक है।

माननीय सभापतिः क्या वे सब एक साथ नहीं पढ़े जाएंगे?

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः नहीं महोदय, उन्हें एक साथ नहीं पढ़ा जाएगा।

माननीय सभापतिः यदि ‘अथवा’ शब्द जोड़ दिया जाए, तो कोई संशय व्याप्त नहीं रहेगा।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मैं इसे जरूरी नहीं मानता हूँ।

(संशोधन संख्या 2425, 2426 और 2427 प्रस्तुत नहीं किए गए।)

* * * * *

* माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मैं अपने मित्र श्री त्यागी के खातिर ही उत्तर

* ख्., सीएडी, खण्ड VIII, दिनांक 2 जून, 1948, पृ. 568

* वही, पृष्ठ 570-7