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96 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

में विभाजित किया जाएगा, नागरिक, विदेशी और तीसरी श्रेणी ऐसे व्यक्तियों की होगी जिन्हें डोमिनियन निवासी कहा जाएगा जो किसी देश विशेष में निवास कर रहे होते हैं। इस सबका अर्थ यही होगा कि भारत में निवास कर रहे डोमिनियम निवासियों को विदेशी नहीं माना जाएगा उन्हें कुछ ऐसे अधिकार मिलेंगे जो विदेशियों को नहीं होंगे लेकिन निश्चय ही उन्हें नागरिकता के पूरे अधिकार नहीं मिलेंगे जो हम अपने देश के लोगों को देने जा रहे हैं। मेरा तो यही मानना है। मुझे आशा है कि मेरे मित्र श्री त्यागी के मन में जो कुछ शंका मौजूद है, वह समाप्त हो जाएगी।

श्री महावीर त्यागीः आपने जो रोचक भाषण दिया, उसके लिए मैं आपका हृदय से धन्यवाद करता हूँ।

¹डॉ. अम्बेडकर और श्री टी.टी. कृष्णमाचारी द्वारा प्रस्तुत संशोधन स्वीकृत हुए। अनुच्छेद 167, तद्नुरूप संविधान में जोड़ा गया।ह्

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अनुच्छेद 169

* माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर (बम्बईः जनरल)ः महोदय, कुछ दिन पहले इस मामले पर सभा में बहस की गई थी, जब हम लोग संसद के विशेषाधिकार पर चर्चा कर रहे थे और मैंने यह सोच लिया चूंकि सभा ने संसद के विशेषाधिकार और निरापदता से संबंधित अनुच्छेद को स्वीकार कर लिया इसलिए जब हम राज्य विधानमंडल के संबंध में वही उपबंध करने जा रहे हैं, तो आगे और बहस नहीं होगी। लेकिन जब बहस शुरू की जा चुकी है और जैसा कि मेरे मित्र श्री कामत कह चुके हैं कि प्रेस भी इस बात से उत्तेजित है, तो मेरे विचार से यह वांछनीय है कि मैं यह बताऊँ कि पिछली बार जब बहस हुई थी तो प्रारूप समिति ने जो तरीका अपनाया उसका वास्तविक कारण क्या था। मैंने स्थिति को स्पष्ट करने के लिए बहस में हस्तक्षेप नहीं किया था।

मैं नहीं जानता कि कितने सदस्य विशेषाधिकार का क्या अर्थ है, उसकी क्या संकल्पना है, के बारे में वास्तव में जानकारी रखते हैं। अब मेरे विचार से विशेषाधिकार की दो अलग-अलग श्रेणियाँ हैं सबसे पहले, तो सदस्यों के व्यक्तिगत विशेषाधिकार होते हैं, उदाहरण के लिए भाषण की स्वतंत्रता, अपने कर्त्तव्य के निर्वहन के दौरान गिरफतार नहीं किए जाने की संरक्षा। लेकिन विशेषाधिकार में सिर्फ इतनी ही बातें शामिल नहीं हैं।

डॉ. पी.एस. देशमुखः हम विशेषाधिकार का ब्यौरा नहीं चाहते और न ही इस बारे में कोई व्याख्यान सुनना चाहते हैं कि उनका किस प्रकार प्रयोग किया जाना चाहिए।

* ख्., सीएडी, खण्ड VIII, दिनांक 3 जून, 1949, पृ. 582-84