अनुच्छेद 169 - Page 118

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विरुद्ध भावनात्मक प्रतिक्रिया को छोड़कर प्रारूप समिति द्वारा अपनाए गए विकल्प के विरुद्ध दिए गए तर्क में कोई सार है। मेरा केवल यह सुझाव है कि इस अनुच्छेद में केवल संभव तरीका अपनाया गया है और हमारे लिए और कोई दूसरा विकल्प नहीं था। ऐसी स्थिति में मेरा सुझाव है कि हमने जिस रूप में इस अनुच्छेद को प्रारूपित किया है, उसी रूप में इसे स्वीकार कर लिया जाए।

डॉ. पी.एस. देशमुखः माननीय सदस्य ने मेरे दूसरे सुझाव के बारे में कुछ नहीं कहा है।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः जैसा कि मैंने कहा कि आप यदि सभी विशेषाधिकारों और संरक्षाओं को विस्तार से वर्गीकृत करना चाहें तो इसके लिए कम से कम बीच-पच्चीस पृष्ठ चाहिए।................... *

माननीय सभापतिः डॉ. देशमुख का सुझाव यह था कि राज्यों के विधानमंडलों से संबंधित इस अनुच्छेद में हम केवल यह उपबंध कर सकते हैं कि राज्य विधानमंडलों के सदस्यों के भी वही विशेषाधिकार होंगे जो हमारे संसद सदस्यों का है।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः वह तो केवल एक प्रारूप संबंधी सुझाव है। उदाहरण के लिए, यह कहा जा सकता है कि हम राजय विधानमंडलों के लिए जो अनुच्छेद स्वीकार कर रहे हैं, उनमें से अधिकतर कमोबेश वे ही अनुच्छेद हैं जो हमने केन्द्र में स्थित संसद के लिए स्वीकार किए हैं। हम यह भी कह सकते हैं कि अधिकतर दूसरे मामले में वही उपबंध राज्य विधानमंडल मामले में लागू होंगे, लेकिन जब हमने उस विकल्प को अपनाया ही नहीं, तो फिर मामला विशेष में इसे अपनाना अजीब लगता।

माननीय सभापतिः मैं पहले श्री जसपतराय के संशोधन को सभा में रखूँगा।

फ्कि अनुच्छेद 169 के खण्ड (4) में फ्किसी राज्य विधानमंडल की सभाय् शब्दों के बाद ‘या किसी समिति’ शब्द अन्तःस्थापित किए जाएँ।य्

संशोधन स्वीकृत हुआ।

अनुच्छेद 169, यथासंशोधित रूप में, संविधान में जोड़ा गया।

* * * * *

* ख्., डाट्स व्यवधान को दर्शाता है।

सीएडी, खण्ड VIII, दिनांक 3 जून, 1949, पृ. 584