अनुच्छेद 110 - Page 121

102 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

वास्तव में बहस मुद्दे से हट गई है और मेरे मित्र श्री नजरुद्दीन अहमद ने अपने संशोधनों 1904 और 1907 में जो मुद्दे उठाए थे, सदस्यगण उससे काफी दूर भटक गए हैं। हमारे सामने संशोधन 1904 है। उस संशोधन के अनुसार मेरे मित्र श्री नजरुद्दीन अहमद यह सुझाव देना चाहते हैं कि अनुच्छेद 11 के उप-खण्ड (1) के अंत में कुछ शब्दों अर्थात् फ्इस संविधान की व्याख्याय् शब्दों को हटा दिया जाए। मुझे खेद है कि उन्होंने ‘इस संविधान की व्याख्या’ शब्दों को हटाने के लिए जो आधार बताए थे, मैं उन्हें पूरी तरह नहीं सुन पाया। यद्यपि मैंने उनकी बात समझने की पूरी कोशिश की और मैंने उनको यह कहते सुना कि संशोधन संख्या 1904 प्रस्तुत करने का कारण यह है कि उन्होंने यह महसूस किया कि इन शब्दों की अपनी सीमाएं हैं और यदि ये शब्द रखे गए तो उन मामलों में जिनमें संवैधानिक कानून अंतर्ग्रस्त नहीं होगा, उच्चतम न्यायालय में अपील करने का उपबंध नहीं होगा।

श्री नजरुद्दीन अहमदः मैं समझता हूँ कि मेरी बात सही है।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः प्रमाणपत्र दिए जाने का प्रश्न नहीं उठता।

श्री नजरुद्दीन अहमदः कल तो आप उसे हटाना चाहते थे।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मैं समझता हूँ कि मेरे माननीय मित्र श्री नजरुद्दीन संभवतः इन अनुच्छेदों को जो उच्चतम न्यायालय से संबंधित हैं, कि व्यवस्था ठीक से समझ नहीं पाए हैं।

श्री नजरुद्दीन अहमदः हमेशा यही कहते हैं।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः इस प्रारूप संविधान में हमने जिन मामलों में संवैधानिक प्रश्न अन्तर्ग्रस्त हो, और जिन मामलों में संवैधानिक प्रश्न अन्तर्ग्रस्त नहीं हो, में अपील करने के लिए अलग-अलग उपबंध किए हैं। जिन मामलों में संवैधानिक मुद्दा शामिल हो, उनमें अपील करने का प्रावधान अनुच्छेद 110 में किया गया है और जिनमें संवैधानिक प्रश्न अन्तर्निहित नहीं हो, उनके लिए अनुच्छेद 111 में उपबंध किया गया है। इस प्रकार की अपीलों के बीच जिस कारण से यह विभेद किया गया है, मेरे मित्र श्री नजरुद्दीन अहमद संभवतः उसे महसूस नहीं कर रहे हैं। इसलिए मैं इस पूछे गए प्रश्न को स्पष्ट करना चाहूँगा। अनुच्छेद 121 में संशोधन प्रस्तुत होने वाला है जो उच्चतम न्यायालय द्वारा बनाए गए नियमों से संबंधित है। मैंने अनुच्छेद 121 के खण्ड 2 के संबंध में एक संशोधन रखा है जिसमें कहा गया है कि जब भी उच्चतम न्यायालय के सामने कोई अपील आती है और उसमें संविधान का प्रश्न अन्तर्ग्रस्त होता है, तो ऐसे मामलों पर सुनवाई के लिए न्यायाधीशों की संख्या कम से कम पाँच होनी चाहिए, जबकि अन्य मामलों में जहाँ संवैधानिक प्रश्न अन्तर्ग्रस्त नहीं हो, हमने मामले को उच्चतम न्यायालय पर छोड़ दिया है, कि वह बनाए गए नियमों के अधीन पीठ गठित करे तथा न्यायाधीशों