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की संख्या तय करे। अब यह एक महत्त्वपूर्ण अन्तर है कि उच्चतम न्यायालय के समक्ष आने वाले संवैधानिक मामले पर पाँच से कम न्यायाधीशों द्वारा निर्णय नहीं दिया जाएगा जबकि अन्य मामलों में की गई अपीलों पर नियम द्वारा निर्धारित न्यायाधीशों की संख्या द्वारा निर्णय दिया जाएगा। अतः मेरे मित्र इस बात को समझ गए होंगे कि ‘इस संविधान की व्याख्या के लिए’ शब्द उन मामलों को छोड़कर जिनके संवैधानिक कानून अन्तर्ग्रस्त हों, अपील करने में कोई बाधा नहीं डालता और वह इस बात को भी समझ गए होंगे कि हम इन दो प्रकार की अपीलों को दो अलग-अलग अनुच्छेदों में रखने का प्रस्ताव क्यों करते हैं, और दोनों मामलों में न्यायाधीशों की संख्या अलग-अलग क्यों है।
अब मैं अन्य मुद्दे पर आता हूँ जिस पर विस्तार से बहस की जा चुकी है अर्थात् क्या उच्चतम न्यायालय के पास आपराधिक मामले में क्षेत्राधिकार होना चाहिए अथवा नहीं। जैसा कि मैं कह चुका हूँ कि जहाँ तक अनुच्छेद 110 और मेरे मित्र श्री नजरुद्दीन अहमद द्वारा प्रस्तुत संशोधन का संबंध है, यह बहस पूरी तरह अप्रासंगिक है और मुद्दे से अलग है और अनुच्छेद 110 के संबंध में हमारे निर्णय को प्रभावित नहीं करेगा। लेकिन चूंकि काफी बहस हो चुकी है, इसलिए मैं कुछ बातें कहना चाहता हूँ। सदस्यगण यह देख सकते हैं कि उच्चतम न्यायालय के समक्ष आपराधिक मामले यदि उसमें संवैधानिक कानून का प्रश्न अन्तर्ग्रस्त हो, लाने के लिए अनुच्छेद 110 में उपबंध किया गया है। इसलिए यह एक रास्ता है जिसके माध्यम से आपराधिक मामले लाए जा सकते हैं और अनुच्छेद 110 के अधीन लाए जा सकने वाले मामले काफी छोटे मामले हो सकते हैं।
फिर, अनुच्छेद 112 है जिसमें प्रिवी कौंसिल का क्षेत्राधिकार उच्चतम न्यायालय में निहित किया गया है। इस समय मैं माननीय सदस्यों का ध्यान फ्किसी मुकदमे या मामले चाहे वह दीवानी मामला हो अथवा आपराधिक मैं डिक्री या अन्तिम आदेश’ शब्दों की ओर ध्यान दिलाना चाहता हूँ ताकि उच्चतम न्यायालय विशेष अनुमति के द्वारा अनुच्छेद 112 के उपबंधों के अधीन आपराधिक मामले पर भी विचार कर सके। मैंने यह गौर किया है कि आपराधिक मामलों के वकीलों में इस प्रकार की भावना प्रबल रही है कि एक उपबंध होना चाहिए .......... *
पंडित लक्ष्मीकांत मैत्राः आपका मतलब प्रैक्टिस करने वाले आपराधिक मामलों के वकीलों से है।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः ठीक कहा आपने, मेरा मतलब प्रैक्टिस करने वाले आपराधिक मामलों के वकील से ही है। अनुच्छेद 111 उच्चतम न्यायालय को केवल दीवानी अपील सुनने की शक्ति प्रदान करता है, उच्चतम न्यायालय को आपराधिक अपील सुनने की शक्ति प्रदान की जानी चाहिए, यदि सभी प्रकार की अपीलें सुनने की शक्ति नहीं भी दी जाए तो कम से कम सीमित चरित्र की अपीलें जैसे कि वे अपीलें जिनमें
* ख्., डॉट्स व्यवधान को दर्शाता है।