104 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
मौत की सजा अन्तर्ग्रस्त हो। अब, मैं यह नहीं कहना चाहता कि उच्चतम न्यायालय के पास आपराधिक मामलों का क्षेत्राधिकार होना चाहिए, के समर्थन में जो तर्क दिए गए हैं, उनमें दम नहीं है। लेकिन प्रश्न है कि यह किस प्रकार किया जाए? क्या हम संविधान में ही ऐसा एक विशिष्ट खण्ड जोड़ दें जिसमें अपील करने का अधिकार होगा या फिर हम संसद को उच्चतम न्यायालय में आपराधिक मामलों में अपीलीय क्षेत्राधिकार प्रदान करने दें? इस समय मेरी राय है - मैं इसे सिद्धांत का मामला स्वीकार करने की बात करता हूँ, मैं इस बारे में खुला दिमाग रखे हुए हूँ। यद्यपि मैं यह बता दूँ कि ऐसा नहीं है कि मेरे दिमाग में इस संबंध में कोई विचार है। इस चरण में संसद को यह शक्ति पर्याप्त है कि वह आपराधिक अपीलों के मामले मेंं क्षेत्राधिकार उच्चतम न्यायालय में निहित कर सके। फिर संसद अन्वेषण न्यायालय को क्षेत्राधिकार देने के बाद उसके लिए कितने कार्य को निपटाना संभव हो पाएगा, यह भी देखना पड़ेगा कि कितने न्यायाधीशों का भार यह देश वहन कर सकता है, आदि बातों पर विचार करके संसद इस बारे में निर्णय लेगी। मेरे विचार में इस प्रश्न को संसद पर ही छोड़ देना कहीं अधिक बेहतर रहेगा क्योंकि इस मामले में निश्चय ही सांख्यकीय दृष्टि से विचार करने की जरूरत पड़ेगी। मेरा दूसरा दृष्टिकोण यह है कि उच्चतम न्यायालय, जिसमें मौत की सजा के मामले में अपील की जा सकती है, को अपीलीय शक्ति प्रदान करने का उपबंध करने की बजाए, मैं तो मौत की सजा को खत्म किए जाने का ही समर्थन करूँगा। (सुनिए, सुनिए) मेरे विचार से यही समुचित कदम होगा ताकि यह विवाद समाप्त हो सके। आखिरकार यह देश अहिंसा के सिद्धांत में विश्वास रखता है। यह इसकी प्राचीन परम्परा रही है और यद्यपि लोग इसका वास्तव में भले ही पालन नहीं करते रहे हों, लेकिन निश्चय ही नैतिक दृष्टि से अहिंसा के सिद्धांत का समर्थन करते रहे हैं और यथासंभव रूप में इस सिद्धांत का पालन किया जाना चाहिए और मेरे विचार से इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए इस देश के लिए समुचित यही होगा कि मृत्युदंड की सजा को समाप्त कर दिया जाए।
* पंडित लक्ष्मीकांत मैत्राः सभी फौजदारी अदालतें भी।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मैं समझता हूँ कि हमें अनुच्छेद 110 में प्रस्तुत संशोधन तथा मेरे मित्र श्री नजरुद्दीन अहमद द्वारा प्रस्तुत संशोधनों तक स्वयं को सीमित रखना चाहिए।
(निम्नलिखित संशोधन स्वीकृत किए गए।)
(1) फ्कि अनुच्छेद 110 के खण्ड (1) के ‘राज्य’ के स्थान पर ‘भारत का राज्य
क्षेत्र’ शब्द अन्तःस्थापित किया जाए।य्
* ख्., सीएडी, खण्ड VIII, दिनांक 3 जून, 1949, पृ. 616