अनुच्छेद 111 - Page 126

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विधानमंडल या प्रांतीय विधानमंडलों ने उच्च न्यायालय की डिक्री, अन्तिम आदेश या निर्णय के विरुद्ध अपील करने की शक्तियों को किसी भी रूप में बदलना उचित नहीं समझा। इसलिए सभा यह महसूस करेगी कि ये धाराएं जो उच्च न्यायालय के अन्तिम आदेश, डिक्री और निर्णय के विरुद्ध अपील करने के अधिकार से संबंधित है, को व्यावहारिक तौर पर 75 से 80 वर्षों तक बने रहने का इतिहास है। उसमें कोई परिवर्तन नहीं किया गया। मेरे विचार से इसके परिणाम-स्वरूप उच्चतम न्यायालय के लिए संविधान में उपबंध करने के लिए एक काफी सशक्त तर्क ढूंढने की जरूरत है क्योंकि इसके कारण एक बनी-बनाई स्थिति में परिवर्तन हो जाएगा जो इतनी लम्बी अवधि से समय पर खरी उतरती रही है।

मुझे यह लगता है कि बहुत दिन नहीं हुए जब यह सभा जो लेजिस्लेटिव असेम्बली के रूप में बैठा करती थी, द्वारा इस बात पर जोर दिया जाता था कि इन शक्तियों जिनका प्रयोग भारत सरकार अधिनियम के अधीन प्रिवी काउंसिल द्वारा किया जाता था, को तत्काल बिना किसी कांट-छांट अथवा छिद्रान्वेषण के फेडरल कोर्ट को प्रदान कर दिया जाना चाहिए। इसलिए मुझे थोड़ा-सा अजीब लगता है कि जब हमने उच्चतम न्यायालय का गठन कर लिया है, जो फेडरल कोर्ट का स्थान लेगा और हमारे पास प्रिवी कौंसिल की शक्तियाँ उच्चतम न्यायालय को हस्तांतरित करने का अवसर मौजूद है, तो हमें यह स्थिति अख्तियार कर लेनी चाहिए थी कि हम उन उपबंधों को उसी रूप में नहीं रखेंगे जिस रूप मे यह आज विद्यमान है। जैसा कि मैंने बताया कि मुझे यह थोड़ा अजीब लगता है। इसलिए पहली बात तो यह कि इसमें तथ्यात्मक दृष्टि से कोई परिवर्तन नहीं किया गया है। हम लोग उच्च न्यायालय तथा प्रिवी काउंसिल की स्थिति को उसी रूप में बरकरार रखने जा रहे हैं और उन्हें उच्च न्यायालय तथा उच्चतम न्यायालय के रूप में स्थापित करने जा रहे हैं।

महोदय, अब मैं वास्तविक संशोधनों पर आता हूँ। अर्थात् प्रो. शिब्बन लाल सक्सेना के संशोधन और मेरा संशोधन संख्या 25 जिसका उल्लेख मैंने अपने भाषण की शुरुआत में किया था। यदि मेरा संशोधन पारित हो जाता है, तो इसका परिणाम यह होगा कि उच्चतम न्यायालय अपील न्यायालय बना रहेगा और संसद अपील न्यायालय के रूप में इसके दर्जे को नहीं घटा के यद्यपि संसद के पास उच्चतम न्यायालय में की जाने वाली अपीलों की संख्या या अपीलों के स्वरूप को घटाने की शक्ति मौजूद रहेगी। किसी भी रूप में, अनुच्छेद 111 का उप-खण्ड (ग) बना रहेगा तथा संसद की शक्ति से बाहर रहेगा। मेरा विचार यह है कि यद्यपि प्रिवी काउंसिल में जाने वाले मामलों के अन्तर्ग्रस्त रकम के बारे में निर्णय करने का अधिकार संसद को दे सकते हैं, अनुच्छेद 111 के

खण्ड (1) का अन्तिम भाग (ग) को उसी रूप में बना रहने दिया जाए और संसद